अतुल्य भारत में बसता भारत
| -RN. Feature Desk - May 14 2020 3:57PM

-स्मिता जैन

सुना है कि चमकते चांद की उजली सतह के पीछे स्याह अंधेरा होता है। प्रत्येक खूबसूरती के पीछे एक बदनुमा दाग होता है। यूं तो कई मापदंड है जमाने में अपनी अतुल्यता  को साबित करने के किंतु मेरे भारत जैसा कोई अन्य नहीं। इतिहास के पन्नों को पलटने पर महावीर, बोधय, महाराणा प्रताप, छत्रसाल, गांधी, रानी लक्ष्मीबाई, सरदार पटेल जैसा प्रतापी इतिहास नजर आता है तो दूसरी ओर जयचंद, गोडसे, सिंधिया आदि जैसे कलंकित किरदार भी नजर आते हैं। भारत में जहां अनेकों बार कई सत्ताएं आई और फिर काल के ग्रास में समा गई। वक्त के कालचक्र में सभी बराबरी से घूमते रहे किंतु देश की प्रगति, तरक्की एवं विकास नहीं रुका। देश ने ना जाने कितनी ही विपत्तियों का सामना किया किंतु देशवासियों को साथ लेकर हमेशा आगे चलता रहा है। 

            किंतु वे क्या? मात्र 40 -45 दिनों के कोरोनावायरस लॉक डाउन से देश की सत्ता और देशवासी इतनी कमजोर हो गए  कि जिनको हमने सत्ता सौपीं वह ही हमें शराब खोरी, नशाखोरी और अपराध की ओर धकेल कर रक्षक होकर के भक्षक का काम करने लगे। क्या सदियों पुरानी संस्कृति की अर्थव्यवस्था अपने देशवासियों को दो-तीन माह तक खाद्य सुरक्षा सुरक्षा के साथ जीवन सुरक्षा भी नहीं दे सकती है। सत्ता को पाने के लिए जो राजनीतिक पार्टियां रुपया पानी की तरह बहाकर भोली भाली जनता को अपने वोट बैंक के  मजबूती के लिए खर्च करते हैं। क्या आज उनके पास इतने भी रुपए नहीं कि अपने गरीब, मजदूर और मजबूर और अपने गरीब मजदूर और  कमजोर समाज के मदद कर सकें। वह समाज जो चुनाव जिताने का सबसे बड़ा घटक होता है। रैलियों से लेकर विजय जुलूस में। आज वह इतना असहाय क्यों हो गया है? सत्ता जो चुनावी रैलियों में वादे करती है क्या वह भ्रामक होते जा रहे हैं?

          मेरा देश आजादी के 73 वर्ष की समृद्धि मैं इतना गरीब कैसे हो सकता है। विश्व के पांच मजबूत अर्थव्यवस्था में शामिल होकर मजबूत करने वाले लोगों की लाशों की भी परवाह नहीं करता है सरकार।जीते हुए उनके थोड़े से मदद नहीं है किंतु मर जाने पर लाखों का मुआवजा  घोषित हो जाता है । मुझे तो शक है कि यह सिर्फ झूठा आश्वासन रहता होगा। जब हजारों समाजसेवी ,डॉक्टर ,पुलिस स्वास्थ्य कर्मी, पत्रकार  आदि रोज बाहर आम जनता की सेवा करने के लिए तत्पर खड़े रहते हैं। तब हमारे राजनेताओं को और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों को वातानुकूलित कमरों में क्या वास्तव में सुख मिलता होगा? अगर सच्चे होंगे तो होंगे तो नहीं। क्या सिर्फ देश में दंगे फैलाने और चुनाव के लिए ही हमारे बयानवीर शेर नजर आते हैं। उसके बाद अपने ऐसो आराम में आराम में खो जाते हैं। 

          सच राजनीति सेवा नहीं व्यापार है। क्या फिर से राम-कृष्ण  इस पवित्र भूमि पर अवतार भी लेंगे  इन आधुनिक राकक्षसों का वध करने या फिर आम जनता यूं ही इनके सत्ता लोलुपता का शिकार होते रहेगी। आम जनता सही दिशा में कार्य कर रही है या करती है। किंतु राजनीति सिर्फ राज करने की नीति बन गई है इस छोटी सी सोच से बाहर आकर राष्ट्र निर्माण के विस्तृत सोच के साथ सच्चा मार्गदर्शक चाहता है मेरा देश ताकि कमजोर भारत एक अतुल्य या इंक्रेडिबल इंडिया बन सके। सर्वाधिक युवा मेन पावर ,सबसे बड़ा उपभोक्ता, प्राकृतिक रूप से संपन्न, सामरिक रूप से मजबूत देश को दोगली राजनीति  की कुस्तिष सोच से लालची नेताओं से और सुविधा होगी अफसरशाही से हमें रोजगार  चाहिए। हर वस्तु का आयात नहीं बल्कि निर्यात चाहिये। सत्ता कोई भी आए जाए किंतु निशिचित पंचवर्षीय एवम अन्य योजनायों का क्रियाँवयन्य चाहिये। देश को खोखले और गंदे महानगर नहीं अपितु मजबूत कस्बे और गाँव चाहिये।



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