घर वापसी के बाद भी प्रवासी मजदूरों के सामने बड़ा संकट...?
| -RN. Feature Desk - May 16 2020 3:14PM

-रिजवान चंचल

प्रवासी मजदूरों श्रमिकों के घर वापसी का सिलसिला अभी थमा नहीं है सरकार द्वारा इनके आने की जो व्यस्था की गयी है उसके अलावा भी ये पैदल और चोरी-छिपे घर आने को मजबूर हैं. एक बड़ा सवाल यह भी है उठ रहा है कि आखिर लाखों की संख्या में घर वापसी कर रहे इन प्रवासी मजदूरों का आगे का जीवन कैसे चलेगा? वैश्विक महामारी कोरोना के फैलाव और लॉकडाउन की लंबी अवधि के बीच भारत में प्रवासी मजदूरों श्रमिकों की हालत जिस तरह से दिखाई पड़ रही  हैं उससे स्पष्ट है कि रोजी रोटी के लिए शहरों में पहुंचे लाखों की संख्या में घर वापसी करते ये प्रवासी मजदूर जो अपने लाव लस्कर सामान के साथ तमाम दिक्कतों पेशानियों का सामना कर किसी तरह घर तक पहुँचने में सफल हुए है या पहुँच रहे हैं वो अब क्या शहरों की ओर रुख  करेंगें...?

पंजाब और हरियाणा सरकार ने तो मजदूरों से वहीं रुकने और अपने घरों को न जाने का अनुरोध किया था और किसी तरह की दिक्कत न होने का भरोसा भी दिया था कर्नाटक सरकार इससे दो कदम आगे निकल गई थी और मजदूरों को भेजने के फैसले को ही पलट दिया था लेकिन चहुंओर इस फैसले पर उठते सवालों के बाद राज्य सरकारों को अपना फैसला बदलना पड़ा और ट्रेनों को जाने की अनुमति देनी पड़ी . विभिन्न राज्यों से यूपी और बिहार में लौटने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या बड़ी हैं इन सबके बीच सबसे बड़ी समस्या यह है कि अपनी नौकरी और छोटे-मोटे रोजगार छोड़कर आए ये मजदूर अब अपने घरों पर क्या करेंगे और जीवन निर्वाह कैसे करेंगे? ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था में अब तक जो इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है उसे लेकर श्रम रोजगार से जुड़े कई आर्थिक, औद्धोगिक पहलू तथा तरह तरह के अनदेखे अध्याय भी खुल गए हैं.

पहली बार श्रम शक्ति की मुश्किलें ही नहीं, राज्यवार उससे जुड़ी पेचीदगियां भी खुलकर दिखी हैं. एक साथ बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूरों का अपने घरों को लौटने के असाधारण फैसले के जवाब में राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के पास कोई ठोस कार्रवाई या राहत प्लान नहीं दिख रहा है  जिससे समय रहते हालात सामान्य हो पाये. कहना ना होगा प्रवासी मजदूरों के बीच जान बचाने और अपने घरों को लौट जाने की देशव्यापी दहशत के बीच  सरकारों की मशीनरी भी असहाय ही दिखी है और अब जब बड़ी संख्या में प्रवासी घर की और चल पड़े है तो सरकार ने इस और गंभीरता से सोंचना शुरू किया है और इसके लिए काम भी शुरू कर दिया है. गुजरात, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्य भले ही विकास के कई पैमानों पर अव्वल राज्यों में आते हों लेकिन अपने अपने घरों को बेतहाशा लौटते मजदूरों को रोके रखने के उपाय करने में वे भी पीछे ही रहे.

हालांकि ये भी एक सच्चाई है कि भारत में प्रवासी मजदूरों की स्थिति विभिन्न राज्यों के असमान विकास के साथ जुड़ी हुई है. उन्हें उचित मजदूरी मिले और मजदूरों को काम भी मिले सरकार ने  गरीबों  और जरूरतमंदों के लिए  राहत पैकेज का ऐलान किया है  लेकिन  आर्थिक विशेषज्ञों ने एक व्यापक वित्तीय पैकेज की जरूरत बताई  है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी तरह-तरह के पॅकेज से राहत देने की बात कही है इधर कोरोना संकट के बीच आने वाले दिनों के लिए श्रम शक्ति में सुधार से जुड़े सवाल भी उठे हैं और संघीय ढांचे वाले भारत के लिए विकास कार्यक्रमों और नीतियों पर नये सिरे से चिंतन और क्रियान्वयन की जरूरत भी विशेषज्ञों द्वारा बताई गयी  है. राष्ट्रीय सैंपल सर्वे कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत में श्रम शक्ति भागीदारी दर करीब आधा रह गयी है. यानी पहली बार ऐसा हुआ है कि 15 साल से ऊपर काम करने वाली भारत की आधी आबादी, किसी भी आर्थिक गतिविधि में योगदान नहीं दे पा रही है.

दिसंबर 2019 में श्रम शक्ति भागीदारी दर गिरकर 49.3 प्रतिशत हो गई. 2018 में ये 49.4 प्रतिशत आंकी गयी थी. इस साल मार्च में भारत की आबादी एक अरब 31 करोड़ से ज्यादा हो गई है. भारत की लोकतांत्रिक जटिलता, भौगोलिक विस्तार और विविधता और विकास नीति की एक अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त सी प्रकृति रही है. औद्योगिकीकरण और वृद्धि के आगे राजनीति और संरक्षण ने भी रोड़े अटकाए हैं. विकास और स्थायित्व से जुड़े साक्षरता, गरीबी और गैरबराबरी जैसे पहलुओं को भी नजरअंदाज किया जाता रहा. समावेशी विकास की रणनीति से  परहेज किया जाता  रहा है मानो इसे छू लेने भर से तरक्की का ग्राफ भरभराकर नीचे आ गिरेगा. इसमें कोई दो राय नहीं अब राज्यों को न सिर्फ कौशल आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन देना होगा बल्कि उन्हें अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से भी जोड़ना भी होगा ताकि कामगारों के पास नकदी का अभाव न रहे,

उनके सामने वेतन और पगार का संकट न रहे और उन्हें काम पर रखने वाले उद्योगों के पास उन्हें देने के लिए पर्याप्त धनराशि भी बनी रहे और खपत के लिए एक बाजार भी बना रहे. ऐसे उत्पाद कृषि और बागवानी के अलावा खाद्य सेक्टरों से तलाशे जा सकते हैं. प्रकाशन, मनोरंजन,  प्रसाधन, प्रबंधन, होटल और पर्यटन जैसे सेवा सेक्टरों में भी अपार विस्तार की संभावनाएं हैं. पूंजी निवेश की एक सुनियोजित व्यवस्था तो राज्यों को बनानी ही होगी. वित्तीय सुरक्षा की जिम्मेदारी नियोक्ताओं की भी है और सरकारों की भी. और उनके हालात पर भी गौर करना चाहिए जो स्वरोजगार से जुड़े हैं. ये प्लम्बर, मैकेनिक, रेहड़ी चलाने वाले, फल सब्जी विक्रेता से लेकर नाई, धोबी, रिक्शा चलाने वाले, कूड़ा बीनने वाले और दिहाड़ी मजदूर और कुछ भी हो सकते हैं. ये श्रम बाजार के लगभग अदृश्य लेकिन उपयोगी और उपेक्षित समुदायों में आते हैं.

कोरोना संकट के दौरान हुए हाल के अध्ययनों के मुताबिक असंगठित क्षेत्र में सिर्फ 17 प्रतिशत कामगार ऐसे हैं जिनके नियोक्ता पहचाने जा सकते हैं. शेष 83 प्रतिशत कामगारों का नियोक्ता कौन है, कोई नहीं जानता, फिर उनकी आमदनी या आय कैसे सुरक्षित रह पाएगी. उन्हें काम पर रखा जाएगा या नहीं, ये कैसे सुनिश्चित हो पाएगा. गांव से शहर, फिर शहर से वापस गांव की ओर पलायन करने वाले लोगों की संख्या करीब 10 करोड़ आंकी गयी है, कमोबेश हर दस भारतीयों में एक. सर्कुलर माइग्रेशन करने वाले ये लोग शहरी इलाकों में अंसगठित कामगारों का बड़ा हिस्सा हैं, जो श्रम बाजार की सबसे कम आमदनी या सबसे न्यूनतम वेतन वाली जरूरतों में खपा दिए जाते हैं.

कोरोना संकट के दौर में ये भी एक सबक है कि असंगठित क्षेत्र के इस स्वरूप को बदलने के नीतिगत फैसले होने चाहिए. उसपर असुरक्षित, अस्थायी, गारंटीविहीन या सामाजिक सुरक्षा विहीन होने का जो ठप्पा लगा है, उसे मिटाना होगा. कुशल या अकुशल मजदूरों के पलायन को रोकने और आर्थिक विकास का मजबूत आधार बनाने के लिए हर राज्य में वहां की परिस्थितियों के अनुरूप प्रयास जरूरी है. नौकरी की तलाश में वही लोग निकलते हैं जिन्हें अपने यहां कोई संमभावना नहीं दिखती. यह कितना संभव हो पाएगा, इसे लेकर जानकारों को संशय है. पहली बात तो यह कि सरकार ने उन प्रवासी श्रमिकों के हिसाब से कार्ययोजना तैयार करने को कहा है, जो उसकी नजर में अन्य राज्यों में काम छिन जाने के बाद आए हैं. जबकि श्रमिकों की यह संख्या इससे कहीं ज्यादा है.

साढ़े 12  लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर श्रमिक तो उत्तर प्रदेश में ही आए हैं. दरअसल, सरकार के पास सिर्फ वो आंकड़े हैं जो उसके साधनों से आए, जबकि अपने आप आने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है. वरिष्ठ पत्रकार सुरेश यादव कहते हैं कि इसके लिए पंचायतों को और अधिक मजबूत, सशक्त और आत्म निर्भर बनाना पड़ेगा. वे कहते हैं, सरकार को यह डाटा बेस तैयार करना होगा कि किन क्षेत्रों में कौन से लोग खासतौर पर प्रशिक्षित हैं. जिससे कुछ छोटे उद्योगों को ग्रामीण स्तर पर भी स्थापित किया जा सके और श्रमिकों को आस-पास ही काम मिल सके.

श्रमिक नेता इरसाद अली बताते हैं पहले  उत्तर प्रदेश में  बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां थीं और निजी स्तर पर भी तमाम कारखाने थे मिलें थी धीरे-धीरे ये सब बंद होते गए और लोगों को रोजी-रोटी के लिए महानगरों का रुख करना पड़ा. यदि लोगों को आजीविका  अपने क्षेत्र में मिलने लगे तो भला घर-परिवार को छोड़कर बाहर कौन जाना चाहेगा.” उनका मानना है कि आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण में राज्यों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी होनी चाहिए. अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए, केंद्र सरकार खुद को राज्यों के साथ सहयोग वाले मॉडल का पक्षधर बताती है लेकिन ये दिखना भी चाहिए.



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