आत्मनिर्भर भारत निर्माण
| -RN. Feature Desk - May 23 2020 6:04PM

-स्मिता जैन

कोरोना काल में नगरों महानगरों से ग्रामीण एवं कस्बाई मजदूरों और गरीबों का त्रासदी पूर्ण पलायन भारत के विकास की चकाचौंध का अंधकार  प्रदर्शित करता है। दिन-रात अपने खून पसीने से इन महानगरों को गति देते सब्जी वाले ,रेहड़ी वाले ,टैक्सी वाले  और न जाने कितने अज्ञात लोग इस तरह उनको छोड़कर या लगभग आधा खाली करके उन महानगरों से अपने अपने गांव की ओर की ओर यूं ही पैदल या छोटे-मोटे साधनों से वापसी  1947 की आजादी के बंटवारे के त्रासद को दोहराते हुए करते हैं।

      मुश्किल से दो-तीन माह ही गुजरे होंगे जब भारत विश्व की पांच आर्थिक महाशक्तिओं में शामिल था लेकिन अब 2- 3% या उससे भी कम जीडीपी के साथ हम पुनः उसी 1947 के आसपास पहुंच गए हैं। उस समय तो हमारे देश में बड़ी-बड़ी  औद्योगिक इकाइयां, कल कारखाने भी नहीं थे। तब भारत जरूर गरीब था किंतु अब 2020 में यह हालात वह भी एक पूर्ण बहुमत प्राप्त सरकार और कई राज्यों में उन्हीं की सरकारों के शासनकाल में आश्चर्य होता है। यकीन करने का मन भी नहीं करता है। बड़ी-बड़ी इवेंट में अरबों रुपए का खर्चा हो जाता है किंतु राष्ट्र निर्माता को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।

           वर्तमान स्थिति में जब औद्योगिक उत्पादन दिन प्रतिदिन घटता ही  जा रहा है और हम अधिक से अधिक आयात पर निर्भर होते जा रहे हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों और कंप्यूटराइज होती औद्योगिकता के कारण करोड़ों सुशिक्षित महिला और पुरुष बेरोजगार होते जा रहे हैं। समाज में कई गंभीर विसंगतियां पैदा होती जा रही हैं। तब हमारे समाज को फिर से बहुत कुछ योजनाबद्ध तरीके से सोचने और करने का अवसर अन्य देशों की तरह आत्मनिर्भर बनाने का प्राप्त होता है।

          जैसा कि हम सभी अच्छे से जानते हैं कि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश है। जहां की 70% से अधिक आबादी कृषि और संबंधित रोजगार पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं और 30% औद्योगिक, शैक्षणिक या अन्य रोजगारों से जुड़ी हुई है। इस स्थिति में हमें अपनी कृषि और उसके उत्पादों को वैज्ञानिक एवं पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करके मजबूत बनाना है क्योंकि पेट भरा होने पर ही हमारा दिमाग काम करता है।

       किंतु सरकार अंधों की तरह औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दे रही हैं। जिससे लाखों किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं और उनके परिवार टूटने के कारण हमारा सामाजिक और नैतिक ढांचा भी टूट रहा है। इस को  रोका जा सकता है, किसानों को उनकी लागत और मजदूरी का उचित मूल्य निर्धारण करके। उनको सरकारी सहायता की चंगुल में ना डालकर स्वतंत्र रूप से आत्मनिर्भर बनाना चाहिए।  

            सरकार महंगाई बढ़ जाने का रिस्क लेकर विरोध का सामना नहीं करना चाहती है लेकिन जब हम ब्रांडेड, लग्जरियस और आयातित सामान का उपयोग कर सकते हैं तो थोड़ा महंगा स्वदेशी खाद्यान्न क्यों नहीं ले सकते हैं? आम जनता को इसके लिए जागरूक करना होगा क्योंकि जब खाद, कीटनाशक, बीज, जमीन, पेट्रोल, डीजल आदि महंगे हो रहे हैं एवं विकट जलवायु परिवर्तन का सामना करते हुए हमारे किसान अनाज पैदा कर रहे हैं तो अनाज ही सस्ता क्यों हो? 

       किसान कब तक कर्ज का, मजदूर का या भिखारी जैसा जीवन जीता रहेगा। यदि किसान मजबूत होता है तो गांव और शहर मजबूत होंगे। पलायन रुकेगा और इकोनॉमी भी मजबूत होगी। आज भारत को आत्मनिर्भर बनाना है तो हमें कृषि के साथ फूड प्रोसेसिंग इकाई, हथकरघा और मेड इन इंडिया को मजबूती देना होगी। कोरोना के इस महामारी काल में जहां कई देश भुखमरी से परेशान हैं लेकिन हमारा भारत नहीं क्योंकि हमारे पास सर प्लस खाद्यान्न तक मौजूद है।

         हमें अपने खाद्यान्नों को भी संरक्षित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की तरह बड़े-बड़े वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज  को बनाना होगा। यदि ऐसा होता है तो भारत महात्मा गांधी के सपनों का भारत बन जाएगा। जहां हर हाथ को काम होगा और कोई भी भूखा /कुपोषित नहीं होगा। 



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