चीन से दुनिया की नफरत भारत में जगी नई हसरत
| -RN. Feature Desk - May 24 2020 6:03PM

हाँ चीन को उसकी करतूतों के चलते जहाँ सारी दुनिया नफरत की निगाहों से देखने लगी है वहीं यह तो समझ आने लगा है कि ऐसी अनदेखी अब आगे नहीं चल पाएगी. बहरहाल चीन की नीयत और चाल दोनों को समझना जरूरी है. बस यहीं से शुरू होता है चीन के लालच और हवस का एक नया अंतहीन सिलसिला जिसको रोकने के लिए दुनिया की महाशक्तियाँ निश्चित रूप से न केवल जाग गईं हैं बल्कि चीनी हथकण्डों सरीखे तरीकों से अलग फॉर्मेट में जवाब देने की तैयारियों में भी हैं.

-ऋतुपर्ण दवे 

दरअसल चीन की नीयत में कब खोट नहीं थी वह तो हमारी उदारता थी जो बार-बार दोस्ती का हाथ बढ़ाया. कभी हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया तो कभी पलक पांवड़े बिठा उसे झूला तक झुलाया. लेकिन उस चीन से क्या उम्मीदें जिसने समूची दुनिया को वुहान के रास्ते मौत के मुहान तक पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी? दुनिया पर अपने व्यापार का सिक्का जमाने की अंधी होड़ से अब उसकी नीयत दुनिया का थानेदार बनने की भी झलकने लगी है. पिद्दी सा नेपाल जो भारत का सबसे करीबी दोस्त, हमदर्द और सुख-दुख का साथी   था एकाएक आँखें दिखाने लगा. वह भी तब, जब तमाम दुनिया का ध्यान वुहान लैब की करतूतों, इंसानी हाथों बने वायरस की तोड़ और इससे मौत के सच का सामना कर रही है. चीन अपनी मदद के टुकड़ों के सहारे बुरी तरह से गरीबी झेल रहे नेपाल जैसे गरीब देश से भारत को आँखे दिखवा, एक तरह से युध्द का अघोषित हुँकार भर रहा है.  

कोरोना की आड़ में चीन पहले ही अघोषित बॉयोलॉजिकल वर्ल्ड वार कर रखा है जिसमें लाखों जिन्दगियाँ जा चुकी हैं तथा  मौतों की रफ्तार 6-7 महीने के बाद भी थम नहीं रही है. यह जैविक युध्द साल के अंत तक बल्कि आगे भी चल सकता है.  चीन की इसी करतूतों के चलते तमाम दुनिया नफरत की निगाहों से देखने लगी है और समझने लगी कि ऐसी अनदेखी आगे नहीं चल पाएगी. बहरहाल चीन की नीयत और चाल दोनों को समझना जरूरी है. चीन के लालच और हवस के अंतहीन सिलसिले को रोकने के लिए दुनिया की महाशक्तियाँ निश्चित रूप से न केवल जाग गईं हैं बल्कि चीनी हथकण्डों से भी खतरनाक तरीकों से जवाब देने की तैयारियों में हैं.

कोविड 19 से उबरत् ही चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वार तय है जिसमें भारत की भूमिका खास होगी. इसके अलावा 5जी, सोलर तकनीक का विस्तार व पहुँच, तेल उत्पादों के मूल्य नियंत्रण, पर्यावरण सुधार, कार्बन उत्सर्जन की नई पॉलिसी के साथ सबकी निगाहें दक्षिण कोरिया, अफ्रीका, एशिया, लातिन अमेरिकी देशों पर भी होंगी जो अपनी निर्भरता अमेरिका और चीन दोनों पर ही कम करेंगे. बस यहीं से भारत के लिए नए रास्ते खुलेंगे. यह मौका भारत के लिए निश्चित रूप से धाक और साख दोनों बढ़ाने का होगा. अमेरिका में यदि समय पर चुनाव हो जाते हैं तो काफी कुछ वहाँ की लीडरशिप पर भी निर्भर होगा और यदि ट्रम्प फिर चुने जाते हैं तो भी उनकी तुनक मिजाजी, मुँहफट्ट बयान, ट्वीट वार भारत के गंभीर, सौम्य और समझदारी पूर्ण बयानों के आगे बौने होंगे. निश्चित रूप से दुनिया के तरक्की शुदा मुल्कों के मुकाबले भारत का संभावित सस्ता प्रोडक्शन व लेबर कास्ट, क्वालिटी मैटेरियल जो चीन के मुकाबले बहुत ज्यादा टिकाऊ और भरोसेमन्द हो वो बेहतरीन प्रॉडक्ट देते हैं जो दुनिया भर में पहले से ही अपनी अलग व खास पहचान रखते हैं. 

दुनिया जानती है कि भारत, नेपाल का रिश्ता बेटी और रोटी का है. लेकिन उसमें भी चीन ने दूरिया बना दीं. नेपाल में चीनी भाषा मेण्डरिन सिखाने का खर्चा उठाकर नेपालियों को चीन रोजगार का सपना दिखा रहा है. ऐसे तमाम कारण हैं जिनके चलते नेपाल भारत से ऐतिहासिक रिश्ते बिगड़ रहे हैं. बीते दो हफ्तों में चीन ने गलवान घाटी में अपनी मौजूदगी मजबूत कर करीब 100 टेंट लगा दिए और बंकर्स बनाने के लिए मशीनें ला रहा है. चीन की अब नीयत साफ दिखने लगी है. 2017 में भी डोकलाम में 73 दिनों तक चले में भी परमाणु संपन्न 2 देशों के बीच युद्ध की आशंका बनी थी.

अब चीन के इशारे पर ही नेपाल की कुटिलता दिखी  जिसने 20 मई को भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधूरा समेत 372 वर्ग किमी. क्षेत्र को अपना हिस्सा बताते हुए नया नक्शा जारी कर राजनीतिक और प्रशासनिक रुप से संवैधानिक मान्यता देकर भारत को खुली चुनौती का दुस्साहस किया.  अब चीन को चुनौती देने खातिर भारत को तत्काल अपने श्रम कानूनों, एक्जिट पॉलिसी, लाइसेंस प्रक्रिया और उद्योगों में बचे, खुचे इंसपेक्टर राज को पूरी तरह से सुधारना होगा. चीन के कोरोना की आड़ में रचे छद्म युध्द से बहुत ही चतुराई और कूटनीति से लड़, भारत को दुनिया में आर्थिक, सामरिक, व्यापारिक महाशक्ति बनने के लिए एक-एक कदम फूँक-फूँक कर रखना होगा और रुस, अमेरिका, फ्रान्स जैसे यूरोपियन देश, जापान, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, अरब मुल्कों के साथ दोस्ती और व्यापारिक संबंध बढ़ाने होंगे ताकि दुनिया की महाशक्ति बनने में चीन की कुटिलता का उसी की भाषा में जवाब दिया जा सके जिससे भारत बुध्द के संदेश के रास्ते शांति और व्यापार के मौके फैला दुनिया को सुखी और समृध्द मानवता को नई राह दिखा सके. 



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