कोरोना- अन्ट, बन्ट, सन्ट, कोरोना- आंय, बांय, सांय
| -RN. Feature Desk - Jun 4 2020 4:47PM

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

मुझे कुछ-कुछ याद है कि 10 मार्च 2020 को रंगों का पर्व होली था। कुछ-कुछ से अभिप्राय यह है कि होली के उपरान्त अब तक लाकडाउन और अनलॉक की स्थिति में सर्वथा एकान्तवासी बने मेरी बुद्धि लकवाग्रस्त सी हो गई है। अब तो हालत यह है कि दिन और रात में अन्तर ही नहीं मालूम होता। दिशाओं का बोध भी लगभग समाप्त सा हो गया है। सोचने-समझने की शक्ति समाप्त। न हिन्दू, न मुसलमान, न सिख और न ही ईसाई। जाति और धर्मों का अन्तर भी जेहन से विलुप्त हो गया है। कान कोरोना और कोविड-19 सुनते-सुनते पक गये हैं। एक तरह से इन नामों को सुनते ही शरीर में एलर्जी होने लगती है। इसी तरह लाकडाउन और अनलॉक का जिक्र जैसे ही होता है मन-मस्तिष्क में झनझनाहट शुरू हो जाती है। 

हाँ! इस कोरोना काल में सभी प्रकार के संकटों से गुजरते हुए कुछ नई जानकारियाँ हासिल करने का संयोग मिला है। नई जानकारी क्या है? वह यह कि कोरोना, कोविड-19, नोवेल कोरोना वायरस, वैश्विक महामारी, लॉकडाउन, अनलॉक, कोरोना पॉजिटिव, कोरोना निगेटिव, क्वारंटीन, आइसोलेशन, सोशल डिस्टैन्सिंग, मास्क, सैनिटाइजर, ग्लब्स, पी.पी.ई. किट आदि जैसे आंग्लभाषा के शब्दों की जानकारी हुई। हालांकि मुझे इन शब्दों का हिन्दी अर्थ अभी तक शत-प्रतिशत नहीं ज्ञात हो सका है। इन शब्दों के अलावा तब्लीगी जमात, प्रवासी मजदूर, स्पेशल ट्रेन, कम्यूनिटी किचेन आदि सब लोगों की जुबान पर हमेशा रहे जाहिर है जब लोगों से सुनता था तो मुझे भी इनकी जानकारी हुई। 

इसी बीच समाजसेवा से जुड़े कथित एवं तथा कथित समाजसेवियों के क्रिया-कलाप की भी खबरें मिलती रहीं। इन खबरों में मास्क व सैनिटाइजर वितरण, जरूरतमन्दों को खाद्यान्न, सब्जी, दाल व तेल आदि का वितरण के साथ-साथ कोरोना वारियर्स का माल्यार्पण व पुष्पवर्षा कर सम्मान किया जाना प्रमुख रहे। बीच-बीच में मानव सेवा करने वालों द्वारा पशु-पक्षी सेवा भी किया जाता रहा। महिलाओं में स्वास्थ्य, स्वच्छता के दृष्टिगत सैनिटरी पैड का वितरण किया जाना काफी चर्चा में रहा। समाज सेवियों ने कुत्ता, बिल्ली, आवारा पशु, बन्दर के प्रति इतना प्यार दिखाया जिसे देखकर मुझ जैसा मानव डिप्रेश हो गया। 

इन्हीं समाज सेवियों जन-जागरण के दृष्टिगत यमराज जैसे किरदार में अपने कार्यकर्ताओं को उतारा था, इसके अलावा एन.जी.ओ. संचालकों ने नुक्कड़ नाटक के जरिये लोगों को जागरूक का प्रयास किया था। परन्तु उसका परिणाम यह रहा है लोगों में जागरूकता कम फैली और सोशल डिस्टैन्सिंग की धज्जियाँ ज्यादा उड़ी। इसी तरह की गतिविधियाँ पुलिस डिपार्टमेन्ट द्वारा भी की गई थी। जिसमें उत्साह कुछ ज्यादा ही दिखा था। लोग जागरूक तो हुए होंगे परन्तु नाटक के किरदारों को देखने के लिए उमड़ी भीड़ से सोशल डिस्टैन्सिंग तार-तार हुई थी। और सोशल गेदरिंग को बढ़ावा मिला था। 

लाकडाउन के प्रथम चरण से अब तक घरों में लोग दूरदर्शन पर प्रसारित धार्मिक धारावाहिकों का लोगों ने न सिर्फ आनन्द लिया बल्कि अपने जीवन में इसे चरितार्थ भी करने लगे। लगभग हर घर में झगड़े-झंझट बढ़ गये, आपसी चिक-चिक शुरू हो गई। मुझे भी यह सब अनुभव करने का सौभाग्य मिला। मैंने देश के पी.एम. को हमेशा याद रखा। इन्हीं के दिशा-निर्देश और अपील पर घर में नाचकर 22 मार्च को सायं 5 बजकर 5 मिनट पर थाली-ताली बजाकर 5 अप्रैल रात्रि 9 बजे 9 मिनट के लिए घरों की बत्ती गुल कर मोमबत्ती भी जलाया। माफ करियेगा ऐसा करने के पीछे मेरा कोई राजनैतिक उद्देश्य नहीं था, और न ही मैं किसी पार्टी विशेष का समर्थक हूँ। 

वैश्विक महामारी से बचाव के लिए इस लाकडाउन को लेकर तरह-तरह की भ्रान्तियाँ और टिप्पणियाँ की जा रही हैं। जिन्हें पढ़कर हर कोई हक-बक-उदास-निरोश-बेचैन हुए बिना नहीं रह पा रहा है। कोरोना वायरस यानि कोविड-19 को लेकर मैं समझता हूँ यह नाम काफी भ्रम पैदा करने वाला है। इसीलिए इसको मैं वैश्विक महामारी न कहकर ग्लोबल कन्फ्यूजन कहता हूँ। आप क्या कहते हैं यह आपकी सोच पर निर्भर करता है। मित्रों! मैंने एक कथित पढ़े-लिखे से दूरभाषीय सम्पर्क कर हाल-चाल लेने के उपरान्त उससे पूछा था कि सोशल डिस्टैन्सिंग और फिजिकल डिस्टैन्सिंग में क्या अन्तर है। 

अपने पी.एम. सोशल डिस्टैन्सिंग, सोशल डिस्टैन्सिंग का बार-बार जिक्र कर आखिर कहना क्या चाहते हैं। तो उस पढ़े-लिखे कथित विचारक ने जो जवाब दिया था यदि उसको लिख दिया जाये तो मुझे अलगावादी श्रेणी में रख दिया जायेगा। इसीलिए उसका जिक्र नहीं कर रहा हूँ। बस इतना जान लीजिए कि सोशल डिस्टैन्सिंग का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक दूरी और फिजिकल डिस्टैन्सिंग का अर्थ होता है भौतिक दूरी। हालांकि अपने-अपने घरों में रहने वाले शादी-शुदा परिवारदार लोग लाकडाउन के इस नियम का कितना पालन कर रहे हैं, या किये होंगे बेहतर वही जान सकते हैं।

लाकडाउन में मेरे परिवार में भी कई ऐतिहासिक/पौराणिक कथाओं का मंचन हुआ। जिसमें श्रवण कुमार ने जमकर पितृभक्त का ऐसा किरदार निभाया जिसके परिणाम स्वरूप मेरे बदन में माँस और हड्डियों में होने वाला दर्द अब भी टीस मारता है, और मैं कराह उठता हूँ। क्षमा करियेगा कृपा कर कंस और दुर्योधन रूपी मेरे एक मात्र पुत्र सन्तान के कृत्य को सुनकर उसे कलयुगी पुत्र की संज्ञा मत दीजिएगा। 

वैवाहिक जीवन के 45 वर्ष उपरान्त पति-पत्नी में होने वाली जूतम-पैजार को अगल-बगल के लोगों ने देखा-सुना और भरपूर आनन्द लिया। पारिवारिक महाभारत में वाक्युद्ध खूब हुआ, जिसमें वयोवृद्ध जननी ने सभी पक्षों को अपना भरपूर सहयोग दिया। अनुज खफ्तुलहवाश सा होकर किंकर्तव्य विमूढ़ बनकर पेट के अन्दर हर अपाच्य सी बनी बात को इधर से उधर स्वहितार्थ करते रहे। बच्चे भरपूर आनन्द उठाते रहे इस महाभारत का। वह अबोध विचारे क्या जानें कि यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई। इन सभी को अपने बप्पा अपनी दाई अपनी माँ और वह लोग प्रिय लगे जो एकाध रूपए की टॉफी और कभी कभार दो-चार रूपए का फास्टफूड खिलाते हैं। 

मेरे प्यारे मित्रों! इस संकटकाल में मुझे यह सुस्पष्ट हुआ कि मेरे शरीर के अन्दर कितनी इम्यूनिटी है। यदि ऐसा न होता तो जली-भुनी, कमजोर दाँतों से न कटने वाली चपाती, सूखी आलू की भुजिया और गाँव का देशी गुड़ खाकर कब का परलोकगामी हो गया होता। 

मित्रों! अन्त में कहना चाहूँगा कि कोविड-19, वैश्विक महामारी, लॉकडाउन जैसे शब्दों का जुबान पर चिपक जाना इतना प्रभावशाली है कि पूरा व्यक्तित्व सुबह की नींद खुलते ही नित्य की वही पुरानी दिन-चर्या के बावत सोचकर झनझना उठता है। एक तरह से शरीर में सनसनाहट सी होने लगती है। पता ही नहीं चलता कि यह क्या हो रहा है। मुझे कभी लगता है कि जमीन हिल रही है तो कभी आसमान गिर रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? क्या लिखूं-क्या न लिखूं? मेरे इस लेख को आप कोरोना अन्ट, बन्ट, सन्ट कह सकते हैं। क्योंकि मेरी दिमागी हालत कोरोना आंय, बांय, सांय जैसी हो गई है। 



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