हॉटस्पाट बना मोहल्ला, कमरे में कैद कलमकार
| -RN. Feature Desk - Jun 5 2020 3:38PM

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

मेरे प्यारे पाठकों! मार्च 2020 में पड़ने वाले रंगोत्सव होली के ठीक बाद से अब तक मैंने बहुत कुछ खोया है, और थोड़ा-बहुत पाया है। इसे आप कत्तई मेरा दुःखड़ा न समझें, ऐसी आप पर भी बीती होगी। जून 2020 के प्रथम सप्ताह में लाकडाउन-05 यानि अनलॉक-01 शुरू हो गया। भारत देश के प्रान्त उत्तर प्रदेश और इसके तमाम जनपदों की हालत दिन-प्रतिदिन कोरोना धनात्मक को लेकर खराब होने लगी। 

मैं जिस शहर में रहता हूँ वह काफी दिनों तक कोरोना धनात्मक मरीजों से बचा रहा, और इसे ग्रीन जोन का ओहदा मिला था। लेकिन यह शहर भी अब कोरोना के संक्रमण से अछूता नहीं रहा। मेरे मोहल्ले/वार्ड/कॉलोनी में एक ही परिवार के पिता-पुत्र सहित दो लोग कोरोना धनात्मक पाये गये। यह लोग माइग्रेन्ट लेबर बनकर बाहरी प्रान्त से यहाँ अपने घर आये थे। उसी दिन से हमारे वार्ड को हॉटस्पॉट एरिया बनने का गौरव प्राप्त हुआ। यह रूतबा तो वार्ड को मिला और मुहल्ले के उस घर को मिला जिसमें कोरोना धनात्मक मिले। शेष अन्य को अपने-अपने घरों में कैद रहने का हुक्मनामा जिला कलेक्टर द्वारा जारी किया गया। आज स्थिति यह है कि हम सब हॉटस्पॉट एरिया के एकान्तवासी बने अपने ही घरों में कैद होकर जिल्लत-जलालत और घुटन भरी जिन्दगी जीने को विवश हो गये हैं। 

यही सब सोच विचार करता हुआ मैं अपने कथरी बिछे तखत पर लेटा हुआ था, तभी सुलेमान मियाँ अपने चिरपरिचित अंदाज में आ धमके, कोई औपचारिकता नहीं। न दुआँ, न सलाम। पान-मसाला की पीक बरामदे के बाहर बजबजा रही नगर पालिका की नाली में उड़ेल कर मेरी स्टडी में आ पहुँचे। टूटे हुए स्टूल पर कराहते हुए बैठे, और बोले अमाँ मियाँ कलमघसीट ढाई महीने हो रहे हैं, यह कैसा कोरोना, और लाकडाउन, इससे कब निजात मिलेगी? समझ में नहीं आ रहा है। मैं कुछ देर तक उनकी बातें सुनता रहा, जो मुझे बकवास ही लग रही थीं। मेरी चुप्पी तोड़ने के क्रम में सुलेमान ने कहा कि मियाँ कलमघसीट कुछ पता है तुमको.....मैंने इशारे से कहा कि कुछ नहीं तुम्हीं बताओं। फिर सुलेमान शुरू होता है और कहने लगा कि जानते हो- हमारे जिले के लोगों ने यहाँ के अधिकारियों से रूबरू होकर मिलने और बात उनसे बात करने में कतराना शुरू कर दिया है। 

यार क्या जमाना आ गया है? कोरोना काल भी गजब काल है। भला बताओ जनता जो फरियादी होती है वह भी कलेक्टर और कप्तान तथा अन्य राजकीय हाकिमों से बात करना भी गवारा नहीं कर रही है। ऐसा क्यों? जानते हो इस लाकडाउन में इतने दिनों तक जिले का हर नागरिक चाहे वह गाँव का हो या फिर शहरी वासिन्दा। सभी कोरोना के संक्रमण और इसकी भयावहता से अब भली-भाँति परिचित हो चुके हैं। इन लोगों का कहना है कि जिला कलेक्टर, पुलिस कप्तान, सी.एम.ओ. एवं अन्य कर्मठ राजकीय मुलाज़िम अब अपनी-अपनी कोरोना जाँच कराकर उसका परिणाम सार्वजनिक करें। ऐसा कहने वालों का तर्क यह है कि ये अधिकारी सीधा कोरोना मरीजों के सम्पर्क में आ चुके हैं। ये सभी स्पेशल ट्रेनों से ढोये जाने वाले प्रवासी मजदूरों जिन्हें कोरोना कैरियर कहा जाता है की अगुवानी कर खान-पान व चिकित्सा व्यवस्था का जायजा लेते रहे। 

जिले के कोविड-19 यानि कोरोना वायरस के प्रति भली-भाँति जागरूक हो चुके लोगों को आशंका है कि इस जिले के आला हाकिम से लेकर अन्य राजकीय अधिकारी कहीं कोरोना धनात्मक तो नहीं हो गये हैं। ऐसे में उन्हें चाहिए कि ये सभी अफसर अपनी-अपनी मेडिकल जाँच कराकर उसका पब्लिकेशन करायें। इससे लोगों में व्याप्त आशंका दूर हो जायेगी। इतना कहकर सुलेमान ने एकदम चुप्पी साध लिया और मेरी तरफ चश्मा उठाकर देखने लगा। ऐसा करने के साथ ही वह मेरी टिप्पणी सुनना चाहता था। मैंने उसका हाल-चाल लिया। घर-परिवार का कुशलक्षेम पूछा। उसने उठकर टूटे मटके से पानी निकाला और पूरा गिलास गटक गया। इसके उपरान्त दोहरा (पान-मसाला) का बटुआ खोलकर सरौता से सुपाड़ी काटने लगा। 

मैं उसकी इस हरकत को न देखकर सोचने लगा कि मैं तो परेशान ही था, सुलेमान भी मुझसे कम परेशान नहीं है। इसकी ईद इस बार नहीं मनी, न हल्ला, न गुल्ला, न मिलन समारोह। ईदगाह में पसरा सन्नाट, मस्ज़िदों में तालाबन्दी। ईद के दिन पुलिस और प्रशासनिक अमला मस्जिद और ईदगाहों पर नजर रखे हुए रहा। खैर! यह सब लिखकर पाठकों का मन कसैला नहीं करना है। बस इतना बता दें कि कोविड-19, वैश्विक महामारी और लाकडाउन ने सब कुछ उल्टा-पुल्टा करके रख दिया है। मन-मस्तिष्क सोचने-समझने की स्थिति में नहीं रह गया। अब लाकडाउन-05 यानि अनलॉक-01 में जर्जर हो चली आर्थिक स्थिति को लेकर लोगों ने रोना शुरू कर दिया है। 

यही सब सोच रहा था कि तभी सुलेमान ने कहा कि यार! कलमघसीट क्या इस कोरोना काल में हम लोग इस धरती से उठ सकते हैं। यदि ऐसा हो जाता तो झंझट भरी जिन्दगी से निजात मिल जाती। उसकी बातें सुनकर मैंने चुप्पी तोड़ी, और कहा कि सुलेेमान डियर! तुम ऐसा काहें कू बोलता है? इतनी लम्बी जिन्दगी में तुमको मैने निराशावादी बनते नहीं देखा। आज ऐसा क्यों? उसने कहा- यार न तो मुझे जीने का शौक है और न ही किसी चीज के पाने की लालसा फिर भी चाहता हूँ कि चलते-फिरते शरीर छोड़ूं। मैंने कहा यार यदि इस कोरोना काल में हम दोनों मर गये तो हमारे जनाजे में 15 से 20 लोग ही शामिल हो सकेंगे। लोगों को कहने का मौका मिल जायेगा कि ये दोनों बुड्ढे कलमकार मरे भी तो कोरोनाकाल में। मरना था तो और पहले ही मर गये होते तब हो सकता है कि जनाजे में शव यात्रियों की संख्या में इजाफा होता। खैर! अब तुम बताओ, कुछ नया अनुभव हुआ हो? उसे कह डालो, बहुत दिन बाद तुम्हारे पास आने का चान्स मिला है। आज समय अधिक हो गया है कुछ तुम भी बोल दो, सुन लूँ, दिल को तसल्ली कर लूँ और फिर उठूँ। घर की तरफ आहिस्ता, आहिस्ता निकल लूँ। 

सुलेमान की बात सुनकर मैंने कहा कि यार सांसत की जिन्दगी जी रहा हूँ। जिले के कलेक्टर ने एकदम कर्फ्यू सा लगा दिया है। खाना-पीना और हगना घर ही में हो रहा है। इससे बड़ी जिल्लत- जलालत और क्या हो सकती है। मैंने तफ्शील से कहा कि मियाँ यह बताओ कि- क्या यह नाकेबन्दी जायज है? वह कुछ नहीं बोला। मैंने दार्शनिक अन्दाज में कहा कि नहीं यह गलत है। और फिर 4 लाइनें लिखवाकर अपने उस कथन को वायरल करवाता हूँ। मैंने अपनी पीड़ा कुछ इस तरह बयां की। 

गाँव और शहर के गली-मोहल्लों को सील करने से कोरोना वायरस भयभीत होकर स्वयं मर जाता है। इस नई रिसर्च की जैसे ही जानकारी मिली प्रशासन ने बड़ी तत्परता से बाँस-बल्ली की व्यवस्था कराकर हमारे गाँव व नगर के सभी गलियों, मोहल्ले और वार्डों को सील करवा दिया। अब कोरोना वायरस से निश्चिन्त होकर हम सभी लोग अपने-अपने घरों में रहें। जब तक खाद्यान्न यानि रसद हो और बची-खुची सब्जियाँ हों तब तक खायें-पीयें और स्वच्छ भारत मिशन को सफल बनाते हुए शौचालयों का उपयोग दिन में जितनी बार चाहें करें। - डी.एम. साहब जिन्दाबाद, एस.पी. साहब जिन्दा बाद, अरे सी.एम.ओ. साहब आपौ जिन्दाबाद।

इतना सबके उपरान्त सुलेमान मेरी स्टडी के पुराने स्टूल पर से उठा और अपने चश्मे के शीशे को गमछे से साफ कर फिर से आँखों पर लगाया। मेरी स्टडी से बाहर निकलकर कहा कि- कलमघसीट चलता हूँ, खुदा हाफिज़। इंशाअल्लाह फिर कभी। और तुम जब इस सीलिंग से निजात पाओ तो मेरे गरीबखाने पर जरूर आना। अल्लाभेज की अम्मी तुम्हें बराबर याद करती हैं। इतना कहकर वह गली में से धीरे-धीरे डग भरता हुआ अपने घर की तरफ जाने लगता है, और मैं पूर्व की तरह तखते पर लेटा कथरी के बावत सोच-सोचकर यह गुनगुनाने लगता हूँ कि- कथरी तोहार गुन ऊ जानै जे करै गुजारा कथरी मा..........। -कलमघसीट 



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