दास्तान-ए-अकबरपुर नगर पालिका: नगरजन बेहाल कोई नहीं है पुरसाहाल
| By- Reeta Vishwakarma - Jun 16 2017 5:07PM

हमारे जनपद अम्बेडकरनगर का जिला मुख्यालयी शहर अकबरपुर नगर पालिका परिषद द्वारा संचालित होता है और 25 वार्डों में विभक्त है। नए परिसीमन उपरान्त इसके चारों तरफ कई दर्जन गाँव पालिका में शामिल किए गए हैं। नपा क्षेत्र में शामिल होने के बावजूद भी इन गाँवों को नगरीय सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है। मसलन साफ-सफाई, जल-निकासी, पथ प्रकाश एवं पेयजलापूर्ति आदि।

नगर निकाय चुनाव के दृष्टिगत कई कथित समाजसेवी उभर कर सामने आए जिन्होंने पोस्टर और बैनरों के सहारे अपने को नपाप अकबरपुर के प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया। परन्तु वास्तविक रूप में इन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिससे जिल्लत-जलालत झेल रहे नगरवासियों का हित हो सके। कई कथित समाजसेवी तो पिछले दो वर्षों से शहर की दीवारों एवं विद्युत पोलों व सड़क के किनारे लगे वृक्षों पर अपना पोस्टर, बैनर लटकाकर फेसबुक जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी स्वयं की तारीफ करते-करवाते चले आ रहे हैं।

बेहतर होता कि ये कथित समाजसेवी जो पोस्टरों, बैनरों और पम्फलेटों तक सीमित हैं वे जन समस्याओं के समाधान न होने की स्थिति में जनता को साथ लेकर अनशन/सत्याग्रह करते। चुनाव जब होगा और नतीजे जब सामने आएँगे तब इन सबको अपनी हकीकत स्वयं मालूम चल जाएगी। एक मजेदार बात यह कि अकबरपुर के वार्ड नम्बर 10 उसरहवा, मलिन बस्ती के कथित सभासद पद के दावेदार से जब किसी ने एक कार्य कराने को कहा तो उसका जवाब था कि पहले चुनाव जिताओ जब अस्त्र-शस्त्र हाथ में आ जाएगा तब काम भी करवा दूँगा।  इसी तरह इस वार्ड के एक पुराने सभासद जो अभी भी हैं उससे बात करने पर स्पष्ट उत्तर मिला कि उसने उक्त कार्य के लिए नपाप की बैठक में प्रस्ताव रखा था जिसे चेयरमैन ने अस्वीकृत कर दिया।

यहाँ बताना जरूरी है कि वर्तमान चेयरमैन नपाप अकबरपुर पिछला लोकसभा चुनाव भाजपा प्रत्याशी के रूप में लड़े थे और उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा था। वह नगरजनों की समस्याओं व उसके निराकरण के लिए कोई रूचि नहीं ले रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि अब वे चेयरमैन पद के लिए चुनाव नहीं लड़ेंगे, जुगाड़ करके एन-केन-प्रकारेण सूबे की सरकार में कोई पद प्राप्त करेंगे। वर्तमान चेयरमैन लगातार दो दशक तक (दो टर्म) चुनाव जीतकर अकबरपुर नपाप का चेयरमैन रहने का कीर्तिमान बना चुके हैं। उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है एक छोटी सी समस्या जो दिक्कत तलब तो है ही साथ ही जानलेवा भी है।

बजबजाती नालियों, बदबूदार माहौल, मच्छरों की भरमार है यहाँ की पहचान

एक मच्छर लोगों को . . . बना देता है. . ., यह डॉयलाग नाना पटेकर ने एक फिल्म में कहा था। वाकई मच्छर इतना छोटा सा जरूर किन्तु खतरनाक प्राणी है जो कई बार लोगों की जान तक ले लेता है। मलेरिया, डेंगू आदि मच्छर जनित रोगों से न जाने कितने लोग काल कलवित हो चुके हैं। बरसात का मौसम लगभग आरंभ होने को है। बरसात में जगह-जगह पानी का जमाव होना आम बात है। जमे पानी में मच्छर अपने अंडे देता है। इसके बाद लार्वा से मच्छर पैदा होते हैं। नगर पालिका और स्वास्थ्य विभाग के द्वारा लार्वा विनिष्टिकरण के लिये अभी से मुहिम चलाये जाने की आवश्यकता है।

नगर पालिका प्रशासन द्वारा भी महीनों से फॉगिंग मशीन शहर में नहीं घुमायी गयी है। पालिका की अनदेखी के कारण जगह-जगह गंदगी, कचरे के ढेर, बजबजाती नालियां सब कुछ मच्छरों के लिये उपजाऊ माहौल तैयार कर रही हैं। यह सब देखकर भी नगर पालिका परिषद कुंभकर्णीय निंद्रा में है। लगता है नगर पालिका को नगर वासियों से कोई लेना-देना ही नहीं रह गया है। बरसात के दिनों में बारिश का पानी कई स्थानों पर एकत्र होगा।

इस पानी में मच्छर के अण्डे बहुत आसानी से विकसित हो जाते हैं। मच्छरों का लार्वा खाने वाली गंबूशिया मछली, मेडिकेटिड मच्छर दानी, डीडीटी, बीएचसी जैसी दवाओं का छिड़काव भी अब गुज़रे जमाने की बात हो गयी है। आधुनिकता के चलते अब घरों में शाम ढलते ही धुंआ करने का चलन भी बंद हो गया है। संपन्न वर्ग तो मच्छरों के शमन के लिये तरह-तरह के जतन कर लेता है पर गरीब गुरबे क्या करें? देखा जाये तो गरीब गुरबों की चिंता करना शासकों का पहला दायित्व है, पर आज के समय मे जो चलन चल रहा है उसमें गरीबों और जरूरतमंद लोगों को प्राथमिकता की फेहरिस्त में सबसे आखिरी पायदान पर ही रखा गया दिख रहा है।



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