अम्बेडकरनगर: अकबरपुर उपनिबन्धक कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार मीडिया की सुर्खियों में
| - RN. Network - Jun 6 2020 2:16PM

अकबरपुर निबन्धन लिपिक भीटी और भीटी के मुख्य निबन्धक लिपिक (सी.आर.सी.) कार्यालय से सम्बद्ध

दोनों लिपिक पा रहे हैं अपनी कर्मठता की सजा

दास्तान-ए-अकबरपुर उपनिबन्धक कार्यालय

जैसा कि यह सर्वविदित है कि प्रदेश के सबसे अधिक फर्टाइल महकमा है उपनिबन्धक कार्यालय। जब भी कभी भ्रष्टाचार एवं सर्वाधिक ऊपरी कमाई करने वाले राजकीय विभाग का जिक्र होता है तब रजिस्ट्री विभाग का नाम सबसे पहले लिया जाता है। यह विभाग देश/प्रदेश के किसी जिले, तहसील में हो इसमें कार्यरत मुलाज़िम और उनसे सम्बन्धित दलाल एवं अन्य लोग मालामाल होते रहते हैं। इन सब के अलावा जब जिस विभाग में ऐसा वातावरण बन जाये जिसका मुखिया जातिवाद से ग्रस्त हो, और उसकी नीति ही धनकमाऊ हो तब ऐसे में उस विभाग की हमेशा चर्चा होना आम बात हो जाती है। 

कुछ ऐसा ही उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले की तहसील अकबरपुर स्थित उपनिबन्धक कार्यालय में हो रहा है। जहाँ मनमाना और जातिवादी माहौल आसानी से देखा व अनुभव किया जा सकता है। यहाँ के सब रजिस्ट्रार और मुँह लगे विभागीय कर्मियों व स्वजातीय तथा दलालों का याराना चर्चा का विषय बना हुआ है। यह चर्चा मात्र तहसील स्तर तक ही सीमित न रहकर जनपद, मण्डल और प्रदेश स्तर पर जोर पकड़े हुए है। इस तरह का माहौल अकबरपुर के रजिस्ट्री कार्यालय में जून 2018 से बना हुआ है। बता दें कि इसी वर्ष और माह में 2 वर्ष पूर्व दिनेश चन्द यादव ने यहाँ के उपनिबन्धक पद की जिम्मेदारी संभाली थी। 

लगातार मिलने वाली इन्हीं सब शिकायतों के परिणाम स्वरूप बीते 2 मार्च 2020 को जिले के जिलाधिकारी राकेश कुमार मिश्र द्वारा उपनिबन्धक कार्यालय (रजिस्ट्री ऑफिस) अकबरपुर का औचक निरीक्षण किया गया था। उस समय भी उपनिबन्धक दिनेश चन्द यादव अपने ऑफिस में अनुपस्थित पाये गये थे। जिलाधिकारी द्वारा जब सब रजिस्ट्रार की अनुपस्थिति के बारे में वहाँ पूछा गया था तो उन्हें बताया गया था कि वह कोर्ट गये हुए हैं। इस औचक निरीक्षण में जिलाधिकारी को अकबरपुर रजिस्ट्री कार्यालय की हालत अस्त-व्यस्त मिली थी। महत्वपूर्ण दस्तावेज पत्रावलियाँ स्टोर में इधर-उधर बिखरी मिली थीं। साफ-सफाई और गन्दगी का साम्राज्य व्याप्त था। जिलाधिकारी राकेश कुमार मिश्र ने इस पर काफी नाराजगी जाहिर की थी। 

सूत्रों के अनुसार यह पता चला था कि काफी दिनों से अकबरपुर उपनिबन्धक कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितता तथा मनमानापन की वजह से सरकार को लाखों रूपए की राजस्व क्षति पहुँच रही है। लगातार मिलने वाली इन्हीं सब शिकायतों की वजह से जिला अधिकारी राकेश कुमार मिश्र ने अकबरपुर उपनिबन्धक कार्यालय में छापा मारकर निरीक्षण किया था। परन्तु इस कार्यालय के लिपिक एवं चतुर्थश्रेणी कर्मचारियों के अलावा उपनिबन्धक दिनेश चन्द यादव मौके पर उपस्थित नहीं मिले थे। 

अपने औचक निरीक्षण में जिलाधिकारी ने बैनामा/वसीयत अभिलेख पत्रावलियों का अवलोक करने के साथ-साथ इस वर्ष 30 लाख से अधिक के बैनामों का भी अवलोकन किया था। डी.एम. ने बैनामा अभिलेख रजिस्टर की जाँच किया तो पाया कि कई बैनामा अभिलेख बैनामादारों को प्राप्त ही नहीं कराये गये थे। इसमें अकबरपुर के जौहरडीह निवासी भगवती प्रसाद का बैनामा दस्तावेज सितम्बर 2019 प्रमुख था, जिसे क्रेता को रिसीव ही नहीं कराया गया था। इसके अलावा बहुत से पुराने बैनामों के दस्तावेज भी स्टोर में इधर-उधर बिखरे पड़े मिले थे। 

बता दें कि नियमानुसार जो बैनामादार एक महीने के उपरान्त बैनामा दस्तावेज नहीं प्राप्त करता है तो उसका लादावा रजिस्टर में बैनामा अंकित कर अतिरिक्त शुल्क लेकर उसे प्राप्त कराये जाने का प्राविधान है। जिलाधिकारी ने अपने औचक निरीक्षण में लादावा रजिस्टर का अवलोकन किया था जिसमें 31 दिसम्बर 2010 से कोई अंकन नहीं किया गया पाया था। 2 मार्च 2020 को जिलाधिकारी अम्बेडकरनगर राकेश कुमार मिश्र द्वारा किये गये औचक निरीक्षण में उपनिबन्धक कार्यालय (बैनामा/रजिस्ट्री कार्यालय) अकबरपुर के सभी कक्ष उन्हें अस्त-व्यस्त ही मिले थे, स्टोर और अभिलेखागार में महत्वपूर्ण पत्रावलियाँ बिखरी हुई बेतरतीब मिली थी। इसके अलावा विभाग के महत्वपूर्ण पंजिकाएँ भी अपूर्ण थीं।

कुल मिलाकर यह महत्वपूर्ण विभागीय कार्यालय जिलाधिकारी को कबाड़खाना ही लगा था। जिलाधिकारी ने मौजूद समस्त स्टाफ को अस्त-व्यस्त पड़े दस्तावेजों को अविलम्ब दुरूस्त करने एवं समस्त अभिलेख पत्रावलियों को पूर्ण कराते हुए कार्यालय की साफ-सफाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। इस औचक  निरीक्षण के उपरान्त कुछ ही दिन में रंगोत्सव होली आ गया, और तत्पश्चात् कोविड-19 के चलते देश में लाकडाउन घोषित हो गया। विभागीय कार्य ऑनलाइन होने लगे प्रदेश सरकार द्वारा भूमि क्रय-विक्रय का कार्य किये जाने सम्बन्धी आदेश के अनुपालन में 15 अप्रैल 2020 से रजिस्ट्री आफिस में कार्य शुरू हो गया।

लाकडाउन-05 यानि अनलॉक-01 में जब फिर से अकबरपुर स्थित उपनिबन्धक कार्यालय में धीरे-धीरे चहल-पहल बढ़ने लगी, तब महकमे के अधिकारी एवं अन्य मुलाज़िमो द्वारा फिर से पारम्परिक रूप से मनमाना और भेद-भाव पूर्ण रवैय्या अपनाकर स्वहितार्थ कार्य किया जाने लगा। इसी बीच पता चला कि एक पुराने कर्मठ कर्मचारी (निबन्धन लिपिक) को उपनिबन्धक अकबरपुर द्वारा सजा के तौर पर यहाँ से हटाकर एक अन्य तहसील पर स्थित उपनिबन्धक कार्यालय में सम्बद्ध करवा दिया गया है। बताया गया है कि इस कर्मचारी को अन्यत्र सम्बद्ध करने के पीछे एक अन्य कर्मचारी जो कथित रूप से लाकडाउन में फंस गया था उसके स्थान पर कार्य करने हेतु अकबरपुर के विभागीय कार्यालय के पुराने कर्मचारी को लगा दिया गया है।

यह अनुशंसा विभाग के उच्चाधिकारियों से सब रजिस्ट्रार अकबरपुर द्वारा की गई है। इसके पीछे उनकी जातीय मानसिकता बताई जा रही है। बाल गोविन्द सिंह (निबन्धन लिपिक) नामक पुराने विभागीय मुलाज़िम ने बताया कि सब रजिस्ट्रार ने पनिशमेन्ट के तौर पर उन्हें अकबरपुर कार्यालय से हटाकर भीटी तहसील स्थित उपनिबन्धक कार्यालय से सम्बद्ध कर दिया है। गुरू प्रसाद मौर्या जो निबन्धन लिपिक उपनिबन्धक कार्यालय भीटी में तैनात थे और लाकडाउन में कथित रूप से फंस गये थे भीटी में बाधित होने वाले विभागीय कार्य को वजह बताकर बालगोविन्द सिंह को वहाँ सम्बद्ध कर दिया गया।

यही नहीं गुरू प्रसाद मौर्य को जिला निबन्धक कार्यालय से सम्बद्ध करने की बात कही गई है, परन्तु बताया गया है कि अभी तक गुरू प्रसाद मौर्य को भी कहीं स्थाई नियुक्ति नहीं दी गई है। गुरू प्रसाद मौर्य निबन्धन लिपिक से पूछने पर उन्होने बताया कि वह जिला मुख्यालय के मुख्य निबन्धक लिपिक कार्यालय से सम्बद्ध किये गये हैं, चूँकि यह विभागीय कार्यालय अस्तित्व में नहीं है, इसलिए वह सुबह से लेकर शाम तक कार्य दिवस पर अकबरपुर स्थित उपनिबन्धक कार्यालय में समय बिता रहे हैं। उन्हें किसी अधिकारी व कर्मचारी से कोई शिकायत नहीं है। गुरू प्रसाद मौर्य ने कहा कि इस विभाग में उन्हें सेवा करते हुए 39 साल हो गये, अब एक साल की बची हुई सर्विस अवधि सकुशल कट जाये, यही चाहते हैं। गुरू प्रसाद मौर्य से बात करते समय अनुभव हुआ कि श्री मौर्य एक अत्यन्त सुलझे हुए व्यक्ति हैं, और कर्मनिष्ठ राजकीय कर्मचारी हैं। 

अकबरपुर के उपनिबन्धक कार्यालय में कार्यरत एक स्थानीय एवं प्रभावशाली कर्मचारी से इनकी खूब छनती है। इस बावत कहा जाता है कि उपनिबन्धक अकबरपुर भूमि, भवन क्रय-विक्रय के सम्बन्ध में इसी मुँह लगे कर्मचारी (लिपिक) से वह गुफ्तगू करते हैं। इसके अलावा स्वजातीय तथा मालदार लोगों को अधिक तवज्जो देते हुए यह भूल जाते हैं कि उनके द्वारा ऐसा किया जाना सरकारी राजस्व को क्षति पहुँचा रहा है। साथ ही उनके कार्य प्रणाली से विभाग की छवि और भी अधिक धूमिल होती जा रही है। सब रजिस्ट्रार अकबरपुर दिनेश चन्द यादव और उपनिबन्धक कार्यालय के अन्य घाघ लिपिक व कर्मचारियों की कार्यप्रणाली में रद्दो-बदल न होने से ऐसा प्रतीत होता है कि इन सभी को जिला कलेक्टर और उच्च अधिकारियों तथा प्रदेश सरकार का कोई भय नहीं हैं।

कहने वालों का तो यहाँ तक कहना है कि पैसे की मार से पहाड़ टूटता है, ठीक उसी तरह सब रजिस्ट्रार द्वारा किया जा रहा है। मनमाना रवैय्या अपनाकर धन कमाना और ऊपर तक पहुँचाना तथा माननीयों से गहरे सम्बन्ध कायम रखना इनका शगल है। और यह सब कुछ ये पैसे के बल पर करते हैं। हो सकता है ऐसा हो, हम तो जो कुछ भी लिख रहे हैं वह सुनी-सुनाई और चर्चा के आधार पर ही है। सब रजिस्ट्रार अकबरपुर से कभी भी दूरभाषीय वार्ता लाख प्रयास के बाद भी सम्भव नहीं हो सकी। क्योंकि वह फोनकॉल ही नहीं रिसीव करते। कमोवेश उन्हीं की तरह अकबरपुर उपनिबन्धक कार्यालय के लिपिक अखिलेश कुमार श्रीवास्तव भी हैं। इनके द्वारा भी फोन कॉल्स कम ही रिसीव किया जाता है। 

इस समय जब लाकडाउन-05/अनलॉक-01 चल रहा है और भूमि, भवन क्रय-विक्रय करने वाले उपनिबन्ध कार्यालय अकबरपुर की तरफ रूख करने लगे हैं तब यह विभाग फिर से सुर्खियों में आने लगा है। ‘‘अकबरपुर उपनिबन्धक कार्यालय में भ्रष्टाचार का बोलबाला’’ नाम शीर्षक से समाचार इस समय सोशल व प्रिन्ट मीडिया की सुर्खियों में हैं। जो निम्नवत है-

उपनिबन्धक कार्यालय में भ्रष्टाचार का बोलबाला

अकबरपुर उप निबंधक कार्यालय में उपनिबंधक पद पर दिनेश चंद्र यादव की मिलीभगत से स्टांप चोरी का मामला जोर-शोर से चल रहा है। स्टाम्प ड्यूटी का खर्च बचाने को मकान की जगह जमीन और आवासीय भूमि को कृषि में दिखाने पर उपनिबंधक अकबरपुर द्वारा निजी स्वार्थ में स्टांप चोरी का 25% वसूल किया जाता है।

बड़े पैमाने पर पंजीकरण के लिए प्रस्तुत लेखपत्रों में स्टाम्प ड्यूटी की चोरी की जा रही है। लेखपत्रों में सही जानकारी नहीं दी जाती है। भले ही मौके पर मकान या दुकान बनी हो लेकिन लेखपत्र में सिर्फ जमीन दिखाकर रजिस्ट्री करा ली जाती है। आवासीय या व्यावसायिक उपयोग की जमीन को कृषि जमीन दिखाकर रजिस्ट्री करायी जाती है ताकि स्टाम्प ड्यूटी को बचाया जा सके। ऐसे मामलों में कई बार विभागीयकर्मियों की मिलीभगत भी रहती है।

चूंकि सर्किल रेट को पुनरीक्षित किया जा चुका है इसलिए अब उसे पुनरीक्षित करने से तो ज्यादा राजस्व बढ़ने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि स्टाम्प ड्यूटी की चोरी पर कड़ाई से अंकुश लगाकर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। भ्रष्टाचार में लिप्त उपनिबंधक के कार्यालय अभिलेखों की जांच की जाए तो भ्रष्टाचार में लिप्त उपनिबंधक के भ्रष्टाचार का खुलासा हो जाएगा।



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