प्रतिभाओं को अपेक्षित सम्मान दिये बिना विकास असम्भव
| Rainbow News - Jun 18 2017 9:07AM

-रवीन्द्र अरजरिया / कर्तव्यों को कार्य संस्कृति बनाकर अपनाने वालों की संख्या में निरंतर ह्रास होता जा रहा है। अधिकारों की दुहाई देने वालों की बढती संख्या स्वार्थसिद्धि के दायरे में कैद होती चली जा रही है। स्वयं के आस-पास इकट्ठा लोगों की भीड को लाभ पहुंचाने की लालसा ने वास्तविक दायित्वों को हासिये पर पहुंचा दिया है। मानवता से लेकर सामाजिकता तक के मूल्यों को आज अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्ष करना पड रहा है। संस्कारों को कथित आधुनिकता में परिभाषित करके भौतिक संसाधनों के ढेर पर अट्ठहास करने वाले लोगों का समूह निरंतर विस्तार लेता जा रहा है। विचारों का मंथन चल रहा था कि कालबेल ने व्यवधान उत्पन्न किया। दरवाजा खोला तो सामने बी.डी.सिंह साहब को अचानक खडा देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उत्तराखण्ड में पदस्थ इस आई.एफ.एस. आफीसर के साथ हमारे सुख-दुःख बांटने के संबंध है।

हमारे दुर्घटनाकाल में उन्होंने बेहद मदद ही नहीं की थी बल्कि भगवान श्री बद्री विशाल के समक्ष एक अनुष्ठान भी किया था। वे दौनों हाथ फैलाकर अपनत्व को आलिंगन की अनुभूतियों तक पहुंचाने का मौन आमंत्रण दे रहे थे। हम कब पीछे रहने वाले थे। सो उन्हीं के अन्दाज में गले मिले।  कुशलक्षेम पूछने-बताने के बाद हम सोफे पर आमने सामने थे। वे जब भी दिल्ली प्रवास पर होते तो हमें जरूर सूचित करते परन्तु इस बार तो बिना पूर्व सूचना के पहुंच जाना, किसी अचानक मिली भेंट से कम नहीं था। अतीत से वर्तमान होते हुए भविष्य की ओर इंगित करने वाली चर्चायें चल निकली। विचारों के प्रवाह को नई गति देने की गरज से हमने अपने मस्तिष्क में चल रहे कर्तव्य, अधिकार और परिणति से जुडे विषय को छेड दिया।

हमारी सोच पर सहमति व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि गम्भीर विषय यूं ही अस्तित्व में नहीं आते। उसके पीछे वे सूक्ष्म तरंगों का योगदान होता है। ब्रह्माण्ड में अनन्त चुम्बकीय तरंगें  निरंतर गतिशील हैं। उनके प्रभाव में आने वाला संवेदनशील मस्तिष्क उस विशेष तरंग के अनुरूप अपनी सोच को जागृत कर लेता है। वे गूढ विश्लेषण की दिशा में अग्रसर होने लगे थे सो हमने उन्हें सीमित बीच में ही टोक दिया। सामाजिक सरोकारों के साथ मानवीय मूल्यों की दुहाई तक ही केन्द्रित रहने का निवेदन किया। गम्भीरता ने मुस्कुराहट बिखेरते हुए सामान्य होने की प्रक्रिया अपनाई। असुरक्षा की मंडी में सुरक्षा तलाशने वाले लोग पैसा, सम्पत्ति जैसे भौतिक संसाधनों के बल पर संरक्षण पाना चाहते हैं।

आसपास की भीड, तिजोरियों में बंद राशि और दस्तावेजों में अंकित मालिकाना हक की तिपाई पर खडे लोगों को सामाजिक संतुलन दिखाने के लिए बेहद मसक्कत का समाना करना पडता है। ऐसे लोग कर्तव्यों का पिंडदान करके अधिकारों के आह्वान करने में जुटे दिखते हैं। कार्य करना और कार्य करते हुए दिखने में बहुत बडा अन्तर होता है। कुछ अपवादों को छोड दें तो ज्यादातर लोग कार्य करने से परहेज करते हैं। स्वयं के दायित्वों को दूसरों पर थोपने का प्रचलन चल निकला है। कार्य संस्कृति को सकारात्मक संस्कारों की परिभाषा से कब का हटा दिया गया है। वातानुकूलति कार्यालय, कार और आवास में कैद होकर रहने वाले जब गरीबों की पीडा पर लिखित वक्तव्य जारी करते हैं तब बहस का बाजार गर्म होता है। क्यों कि उस बयानबाज की यहां तक पहुंचने की औकात वंश, धन या फिर खरीदे गये सम्मान की दम पर हुई है। आक्रोश से उनका चेहरा तमतमा रहा था। शब्दों को ज्वालामुखी बनाने का क्रम जारी था। चारों ओर के वातावरण की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिभाओं को अपेक्षित सम्मान दिये बिना विकास का गौमुख खुल ही नहीं सकता।

षडयंत्रपूर्ण चालों से कुर्सी हथियाने वालों को पहचानने वालों की संख्या में इजाफा होने लगा है। परिवर्तन की लहर को सार्थक सुनामी बनाना होगा तभी अप्रासांगिकता से मुक्ति मिल सकेगी। बातचीत चल ही रही थी कि तभी नौकर ने चाय के साथ नमकीन, बिस्कुट तथा सूखे मेवा की प्लेट्स टेबिल पर लगा दी। बातचीत में व्यवधान उत्पन्न हुआ परन्तु तब तक हमें अपने विचारों को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त सामग्री मिल चुकी थी सो इस विषय पर भविष्य में मंथन करने का आश्वासन लेकर चाय की टेबिल पर पहुंच गये। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगा। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

 

 



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