कृषि– पंडित घाघ और भड्डरी 
| -RN. Feature Desk - Jun 29 2020 1:20PM

-प्रभात कुमार राय 

भारत कृषिप्रधान देश है। पुरातन काल से ही खेती भारतीयों की मुख्य जीविका रही है। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि खेती मानव समाज के सुखों की जननी है। आर्य, जो इस देश के आदिम निवासी थे, खेती करते थे। पराशर मुनि ने कहा है – 
‘अवस्त्रत्वं निरन्नत्वं कृषितो नैव जायते ।
अनातिश्चस्व दुखित्वं दुर्यनो न कदाचन ।।‘
 खेती करनेवालों को वस्त्र और अन्न का कष्ट नहीं होता ।अतिथि-सेवा में असमर्थता तथा अन्य दुःखों से उनके मन में खेद नहीं पहुँचता । कृषि की चिंता भारतीय मनीषियों को सदा से रही है । पूर्वकाल में, जब इस देश की भाषा संस्कृत थी, तब कृषि संबंधी ज्ञान श्लोक- बद्ध था। आचार्य वराहमिहिर  ( 505 ई• लगभग ) के वृहत्संहिता से ज्ञात होता है कि पूर्वकाल से गर्ग, पराशर, काश्यप और वात्स्य मुनियों को वर्षा के बारे मे प्रचुर जानकारी थी। बानगी के तौर पर वृहत्संहिता का एक श्लोक उद्धृत है:
 ‘ अन्नं  जगत प्रायः प्रावृट्कालस्य चान्नयात्तम् ।
यस्मादत परीक्ष्यः प्रावृट्कालः प्रयत्नेन ।। 
    (अन्न ही जगत का प्राण है, और यह वर्षा के अधीन है । इस कारण से यत्नपूर्वक वर्षाकाल की परीक्षा करनी चाहिए।)
    किसान की सबसे बड़ी अभिलाषा होती है कि मानसून में बारिश अच्छी हो ताकि लाभकारी पैदावार हो और वे आर्थिक रूप से सुदृढ़ बन सके। ‘ पर्जन्यादन्न सम्भव्: ‘ – समुचित वर्षा होनेपर ही अन्न की उपज ठीक से संभव है । वाचस्पति कोश में पराशर के तमाम श्लोक संस्कृत में 
हैं जिसमें कृषि संबंधी नियमों का वर्णन किया गया है । ऐसा माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत महर्षि नारद और भृगु से  आरंभ हुई । महर्षि भृगु द्वारा ज्योतिष शास्त्र की प्रामाणिक ग्रंथ ‘ भृगु संहिता ‘ लिखी गयी जिसकी सूक्ष्म गणनाएं चमत्कारपूर्ण एवं अचूक है । जनश्रुति के अनुसार घाघ और भड्डरी इसी भृगु वंश से आते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि वे संस्कृत साहित्य  तथा ज्योतिष परंपरा से  व्यापक ज्ञान अर्जित किए होंगे और अपने अनुभव, मेधा तथा तीक्ष्ण अग्रदृष्टि से कहावतों को गढा होगा । इन्होंने सहज भाषा में किसानों को कृषि एवं मौसम संबंधी बढिया तरकीब सुलभ कराया । उन्होंने घोषणा की कि उनकी कहावतों और उसके फलादेश इतने सटीक है कि पडिया जोशी झूठा हो सकता है,  पर उनकी कहावतों कदापि नहीं ।
          ऐसा माना जाता है कि कि घाघ का जन्म 1753 में हुआ । भड्डरी इनके समकालीन थे।इनका कार्यकाल सम्राट अकबर के समय था। अन्वेषकों के घाघ का जन्म स्थान छपरा (बिहार) था। वहां से वे अपने ससुराल कन्नौज चले गए और वहीं बस गये । इसी कारण से  उत्तर  प्रदेश के इतिहासकार उनका जन्म स्थान  कन्नौज मानते हैं । भड्डरी का जन्म काशी के पास मारवाड़ में हुआ था । ‘ घाघ कहै सुनु भड्डरी ‘ का प्रयोग कई कहावतों में घाघ द्वारा किया गया है । यह भी संभव है कि घाघ ने अपना अनुभव बताने के लिए ललकारा हो ।
     घाघ जहाँ कृषि, नीति और स्वास्थ्य के लिए विख्यात हैं वही भड्डरी की कहावतें मुख्यतः वर्षा, ज्योतिष  और आचार-विचार से संबद्ध है । इनका  मौसम ज्ञान तथा शुभाशुभ विचार वैयक्तिक अनुभूति पर आधारित है । गेय तथा रोचक ढंग से पेश ये कहावतें उम्रदराज किसानों के जिह्वाग्र में आज भी व्याप्त है ।ग्रामीण आज भी इन लोकोक्तियों को दुहराकर अपनी बुद्धिमत्ता और श्रेष्ठता का परिचय देते हैं । सामान्यतः कोई व्यक्ति अत्यंत नीति-निपुण, गहरी सूझबूझ वाला या सामाजिक विषयों मे पैठ रखनेवाला तो उसे ‘ घाघ  ‘ की संज्ञा दी जाती है ।
       बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा दक्षिण भारत, कश्मीर, पंजाब, गुजरात, ओडिशा, बंगाल, असम एवं अन्य प्रांतों में भी इनकी कहावतें भिन्न-भिन्न भाषाओं और बोलियों में मिलती है । विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी कहावतों का पूरे देश में प्रचार-प्रसार देशाटन करते उन्हीं के माध्यम से या उनके वंशजों द्वारा सतत परिमार्जन कर पारंपरिक रूप से किया गया । पूरे देश में इनके वंशज पड़िया,  जोशी,  भड्डरी, डंक, डाकोची आदि उपनाम से देश में फैले हुए हैं । ज्योतिषीय गणना के साथ-साथ ये ग्रहों की दशा सुधारने तथा शनि शांति आदि के लिए मशहूर है ।
                घाघ की कहावतों की वाचिक परंपरा रही हैं ।कोई प्रामाणिक काव्य संग्रह उपलब्ध नहीं है । भड्डरी की एक लघु पुस्तिका ‘शकुन विचार ‘ उपलब्ध है । वे संस्कृत के ज्ञाता थे और उनकी कई कहावतें ‘मेघमाला’ नामक संस्कृत ग्रंथ में है । 
   कहावतों के माध्यम से खादों के विभिन्न रूपों, गहरी जोत, मेड़ बांधने, फसलों के बोने का उत्तम समय, बीज की मात्रा, दालों की खेती आदि के अलावा ज्योतिष ज्ञान की गहन चर्चा की गई है । इनका अभिमत था कि कृषि सर्वोत्तम व्यवसाय है जिसमें किसान भूमि को स्वयं जोतता है । आजकल आर्गेनिक खेती पर काफी जोर दिया जा रहा है । सदियों पूर्व घाघ ने खादों के बारे मे अत्यंत पुष्ट विचार दिए थे । उन्होंने गोबर , कूड़ा, हड्डी, सनई आदि खादों के व्यापक प्रयोग के लिए श्लाघनीय प्रयास किया । इसकी तुलना 1840 में जर्मनी के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लिबिग द्वारा यूरोप में कृत्रिम उर्वरकों के लिए की गयी मुहिम से की जाती है । आज दलहन की खेती पर विशेष जोर दिया जा रहा है ।इससे दाल की पर्याप्त आपूर्ति के अलावा खेतों मे नाइट्रोजन की की वृद्धि होती है । इन कहावतों पर गौर करें:
‘ खाद परे  तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत ‘
‘ गोबर, मैला, नीम की खल्ली, या से खेत दूनी फली ‘
‘ वही किसानों में है पूरा, जो छोडे हड्डी का चूरा ‘
घाघ का मानना है कि अगर खाद छोडकर गहरी जोत कर दी जाय तो खेती काफी लाभप्रद हो जाता है:
‘ छोड़े  खाद  जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई ‘
 जिस किसान के खेत में गोबर नहीं पड़ता है, उसमें कोई भी फसल फायदेमन्द नहीं हो सकती:
‘ जिसके खेत पड़े नहीं गोबर, सो किसान सबसे दूबर ‘
जब खेत में गोबर, मैला और पत्तियां सडती है, तब उपज में काफी बढोतरी होती है:
‘ गोबर, मैला, पाती संडे,फिर खेती में दाना बढे ‘
 अधिक उपज के लिए बोआई के उपयुक्त समय के बारे में घाघ की अनेक कहावतें है ।
‘ रोहिणी खाट, मृगशिर छौनी । आये आद्रा, धान की बौनी ‘ 
किसान को चाहिए कि रोहिणी नक्षत्र में खाट की बिनाई, मृगसिरा में छप्पर की छवाई कर ले। आद्रा नक्षत्र चढने पर धान की बोआई का काम करे।
‘ चित्रा गेहूं आद्रा धान, ना लागे गेरुइ न लागे घाम ‘
चित्रा में गेहूं और आद्रा नक्षत्र में धान बोने से गेरुइ (एक प्रकार का फसल रोग) का प्रकोप नहीं होता तथा धान में धूप का भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है ।
    ‘ आद्रा धान पुनर्वषु पैया। रुवै किसान जो वुबै चिरैया ।‘
     आद्रा नक्षत्र में धान बोने से अच्छा फल मिलता है । पुनर्वषु में बोने से बिना चावल का धान होता है और पुष्प नक्षत्र में धान बोने से किसान रोता ही रह जाता है ।
    ‘ आद्रा रैड़ पुनर्वषु पाती । लगै चिरैया दिया न बाती ।‘
    आद्रा नक्षत्र में धान बोने से डंठल कड़े और पुनर्वषु में पत्तियां ही पत्तियां होती है तथा पुष्प में बुआई से अंधकार हो जाता है  यानी नाममात्र की उपज होती है ।
      इस बार आद्रा नक्षत्र के प्रवेश से ही अच्छी बारिश निःसंदेह एक शुभ संकेत है । धान की बोआई किसानों द्वारा पूरे उत्साह से किया जा रहा है ।
   घाघ द्वारा बीज के परिमाण का भी परिशुद्धता के साथ व्यौरा दिया गया है ।
 ‘ सवा सेर बीघा, सावां जान। तिल सरसों, अंजुरी परमाण। कोदो, बरै, सेर बोआओ । डेढ़ सेर बीघा, तीसी नाओ ।‘
 प्रति बीघे में सवा सेर सावां, तिल्ली और सरसों एक-एक अंजुली, कोदो और कुसुम एक सेर तथा अलसी को डेढ़ सेर तक खेत में डालना चाहिए । इससे दुगुनी उपज की संभावना रहती है ।
‘गेहूं जौ बोवै पांच पसेर, मटरै बीघा तीस सेर। बोवे चना पसेरी तीन, तीन सेर बीघा जोन्हरी लीन ।‘
  गेहूं और जौ हर बीघे में पांच पसेरी, मटर तीस सेर, चना तीन पसेरी तथा मक्का के बीज का तीन सेर बोना चाहिए ।
‘डेढ़ सेर बिगहा बीज कपास, दो सेर मोथी अरहर मास । पांच पसेरी बिगहे धान, तीन पसेरी जरहन जान। ‘
   कपास प्रति बीघे में डेढ़ सेर, मैथी, अरहर, उड़द को दो सेर के हिसाब से बोना लाभप्रद है । हर बीघे में पांच पसेरी धान तथा जड़हन तीन पसेरी बोना उचित है ।
            हवा की दिशा और वेग के आधार पर मौसम का सटीक पूर्वानुमान में घाघ पारंगत थे। वे प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण में दक्ष थे।मेंढक, गिरगिट, गौरैया, बकरी आदि जीवों की गतिविधि, हवा के रुख और आकाश का रंग देखकर वर्षा का सटीक अनुमान कर पाते थे ।
  ‘  दखिनी कुलछनी । पूस माघ सुलछनी ।‘
खेती के लिए दक्षिणी हवा हानिकारक होती है, परंतु अगर पूस माघ के महीने में चले तो लाभकारी होता है ।
‘ पछुवा बादर । झूठा आदर ‘
पश्चिम से उठने वाले बादल पर भरोसा नहीं करना चाहिए । झूठे मनुष्य का आदर करना वृथा है ।
‘हवा बहै ईसाना । खेती ऊंची करो किसाना।‘
अगर ईषाण ( पूर्व और उत्तर) कोण से हवा बहने लगे तो अच्छी बारिश होगी ।
  ‘ भादो जै दिन पछुवा प्यारी, तै दिन माघै पडती ठारी।‘
भादो के महीने में जितने तक पछुवा हवा बहती है,  माघ में उतने ही दिन पाला पड़ता है । बिहार में आज भी पान और तंबाकू की खेती करनेवाले किसान इसके अनुसार पाला से फसल को बचाने के लिए उचित सावधानी बरतते हैं।
 ‘ उत्तर चमके बिजली, पूरव बहै जु बाव। घाघ कहे सुन रागिनी, बरधा भीतर लाव ।‘
   यदि उत्तर दिशा में बिजली चमकती हो और पूरवा हवा बह रही हो तो घाघ अपनी पत्नी को कहते हैं कि बैलों को अंदर बाँध लो क्योंकि वर्षा शीघ्र आनेवाली है ।
‘ अगहन द्वादश मेघ अकास, असाढ़ बरसै अखनावास।‘
 यदि अगहन की द्वादशी को आकाश में बादलों का समूह घूम रहें हों तो आषाढ़ में मुसलाधार बारिश होगी ।
 पंडित हरिहरप्रसाद त्रिपाठी द्वारा संपादित पुस्तक ‘ घाघ और भड्डरी की कहावतें ‘ के अध्ययन से पता चलता है कि कुछ कहावतों में घाघ और भड्डरी अपने-अपने खास ढंग से मिलते-जुलते भाव व्यक्त करते हैं ।
 ‘ रात निर्मली दिन को छाडी,  कहै भड्डरी पानी नाही ।‘
रात निर्मल हो और दिन में बादल छाया रहे तो भड्डरी का मानना है कि वर्षा नहीं होगी । इसी तर्ज पर घाघ की लोकोक्ति है:
‘ दिन में गर्मी रात में ओस, कहै घाघ वर्षा सौ कोस ।‘
 यदि दिन में गर्मी और रात में ओस पड़े तो वर्षा की कोई आशा नहीं है ।
   घाघ ने अपनी लोकोक्तियों में सिर्फ ख़ास फ़सल के लिए उपयुक्त समय, मौसम का सटीक पूर्वानुमान एवं लाभप्रद खेती के लिए व्यवहारिक टिप्स ही नहीं दिया है बल्कि कतिपय कहावतों में सादगीपूर्ण और स्वस्थ जीवनशैली की सीख भी दी है ।
 ‘ भुइयां खेडे, हर ह्वै चार । घर होय गिहथिन, गऊ दुधार । रहर की दाल, जड़हने क भात । पाकल नीम्बू, औ घी तात । दही खाड जौ, घर में होय। तिरछे नैन, परोसे जोय।घाघ कहै, सबही है झूठा , उहां छाड़ि  इहवै बैकुणठा ।‘
  यदि खेत घर के पास हो, चार हल की खेती हो, गृह कार्य में दक्ष पत्नी हो, दुधारू गाय हो, खाने के लिए अरहर की दाल हो, जड़हन चावल का भात हो, रसदार नीम्बू और घी, घर में ही दुग्ध उत्पाद, शक्कर और दही हो, प्रेमपूर्वक स्त्री परोसे तो घाघ कहते हैं कि बाकी सब इसके आगे झूठ है और स्वर्ग कहीं और नहीं,  यही है ।
        ग्राम्य अंचल में रोजमर्रा की खेती एवं सामाजिक समस्याओं के सम्यक् निदान हेतु व्यवहारिक टिप्स घाघ और भड्डरी की कहावतों में  समाविष्ट हैं । आज शस्य विज्ञान, पादप प्रजनन, पर्यावरण एवं ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में इन कहावतों के गहन अध्ययन और तत्वान्वेषन की आवश्यकता है । जहां पुरानी पीढ़ी इन कहावतों पर भरोसा करतीं हैं, वही नयी पीढ़ी में इस अमूल्य धरोहर के प्रति उदासीनता परिलक्षित होती है । इन कहावतों को सहेजना और उनका निरपेक्ष मूल्यांकन परमावश्यक है ताकि नयी पीढ़ी द्वारा  प्राचीन भारत की कृषि व्यवस्था, सामाजिक एवं आर्थिक पक्ष तथा जीवन दर्शन को वर्तमान  ग्राम्य परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके और सीख ली जा सके।



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