कोरोना....... एक अवसर
| -RN. Feature Desk - Jul 2 2020 1:05PM

-स्मिता जैन

तेजी से बदलती दुनिया में जहां हर कुछ इतनी तेजी से बदल रहा है कि आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता है । आज हम हर और बदलाव ही बदलाव बदलाव ही बदलाव बदलाव देख रहे हैं। चाहे पहनावा हो, रहन-सहन व खानपान,आचार -व्यवहार, संस्कृति ,तकनीक ,समाज, रिश्ते- नाते, संवेदनाएं, सरकारों की विचारधारा और उनके सत्ता हासिल करने के तरीके और बीमारियां आदि । 

       आधुनिक युग  के इंसानों का मस्तिष्क इतना परिवर्तनशील हो गया है कि हमेशा कुछ नया चाहता है । हम रिमोट कंट्रोल से हर चीज को बदलना चाह रहे हैं । शायद हम खुद के खुदा बन चुके हैं । हमें दूसरे लोगों की मजबूरियां ,संवेदनाएं, एहसास आदि का अब कोई का अब कोई  एहसास नहीं होता क्योंकि हम आधुनिक तकनीक का उपयोग करके एक बहुत ही आरामदायक जीवन जी रहे हैं। ऐसे हालात में आज संपूर्ण विश्व एक अदृश्य वायरस, कोरोना वायरस से लड़ रहा है जिसका अभी तक कोई उचित उपचार भी नहीं ढूंढा जा चुका है । शायद कोरोना को इंसान के द्वारा  निर्मित किया गया एक जैविक हथियार के रूप मे।

               कुछ वर्षों के परिदृश्य पर नजर डालें तो संपूर्ण विश्व युद्ध या तानाशाही सरकारों के रवैए से संघर्ष कर रहा है । सरकारें जनता की बुनियादी समस्याओं को दरकिनार करके अपने निहित स्वार्थों का निर्वाहन अपने स्वयं के स्थायित्वकेलिएप्रशासन ,अदालत ,फ़ौज, पुलिस, मीडिया और अपने पोषित  समर्थकों के द्वारा कर रही है जिसमें आम आदमी जैसे किसान, बेरोजगार, मध्यमवर्ग ,गरीब समाज, का शोषण उनके हड्डियों तक से खून चूस कर किया जा रहा है । 

                 वह अपने वोट का प्रयोग करता है सरकारों के अच्छी तरह से कार्यावयं  के लिए किंतु लालची सत्ता उसका दोहन सिर्फ अपने फायदे के लिए कर रही है। चुनाव के पहले उसके सपनों को हवा दी जाती है बाद में उन सपनों को लहूलुहान किया जा रहा है। कोरोना काल इन स्वार्थी और लालची सत्ता के लिए एक स्वर्णिम अवसर लेकर आया है । जहां संपूर्ण विश्व प्राकृतिक आपदा के अंदर नियंत्रित हो रहा है जिसमें जनता का घर से बाहर निकलने से लेकर जीविका उपार्जन ,स्वास्थ्य आदि के लिए सत्ता और प्रशासन के हाथों कठपुतली की तरह  संचालित किया जा रहा हैं।

              हमें आंखों पर काला चश्मा चढ़े लोगों के द्वारा देखा जा रहा है और मार्गदर्शन  किया जा रहा है। क्या आम जनता एक इंसान नहीं है जिसकी अपनी संवेदनाएं और अपनी संवेदनाएं और जरूरतें हैं या मात्र एक  ग्राहक ,वोट या आंकड़ा बन गई है । कोरोना काल में कोरोना सचमुच एक अवसर लेकर आया है उनके लिए जो सत्ता के अनुकूल हो गए हैं उन्हें सत्ता के लाल कालीन पर आसीन किया जा रहा है। उनके व्यापार, उद्योग धंधे में दिन  दूनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है और जो इनके विरोध में हैं उन्हें देशद्रोही बनाकर जेलों में रखा जा रहा है। यह कहां का न्याय है?

कभी उन बेघर गरीब ,मजदूरों, बेरोजगारों, किसानों के दर्द को सही तरीके से समझा ही नहीं गया है जो लाखों-करोड़ों वाहनों, हवाई जहाज ,ट्रेन आदि के होते हुए भी तपती दोपहर में अपने नन्हे मुन्ने  बच्चों सहित पैदल धूप में हजारों किलोमीटर चलकर अपनी गांव या शहरों मे आने को मजबूर हो गए थे। कितने लोगों के परिवार उजड़ गए इस अनदेखी से। 

            विकास का सपना दिखाते- दिखाते कितने ही अनचाहे फैसले लिए गए जो आम जनता के खिलाफ थे चाहे वह नोटबंदी हो,  जीएसटी ,सी ए ए ,NRC आदि जिसमें परिवर्तन के झूठे सपने दिखा कर आमजन का हितैषी बनकर कई बार ठगा गया या ठगा जा रहा है।    अब तो हद होने लगी जब सैनिकों को शहीद कराकर छदम  राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी सत्ता को सिद्ध किया जाने लगा है । सचमुच कोरोना का एक बहुत ही बड़ा अवसर लाया है उनके लिए अपने अभीष्ट की सिद्धि की खातिर। 

               मुद्दों को  शतरंज के मुहरे बनाकर चला जा रहा है और आम जनता को जातीयता का जहर पिलाकर विद्रोह करने के लायक तक नहीं छोड़ा है । बांट दिया है एक धर्मनिरपेक्ष समाज को धर्म के नाम पर जो सदियों  से अपनी विविधता के लिए विश्व पटल पर अपना परचम फैला रहा था। ऐसा लगता नहीं की सचमुच हमारे पूर्वजों के कुछ ऐसे बेरंग से समाज की कल्पना की होगी। अनेकों वीरजवानों ,वीरांगनायों  ने अपने लहू  से अपने पीढ़ियों के सुंदर भविष्य के लिए इस धरा को अभिसिंचित किया होगा ।

             इस कुष्टिस अवसर को देखकर लगता है कि जनता को कभी भी अपना पूरा विश्वास सत्ता के लिए नहीं देना चाहिए क्योंकि सत्ताधारी बाद में अंधे, बहरे और गूंगे बन जाते हैं। अपनी कुर्सी को बचाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद को अपना लेते हैं और भूल जाते हैं कि वह जो वर्तमान लिख रहे हैं वह कभी इतिहास भी बनेगा ।  फिर आने वाली पीढ़ियां उस नपुंसक सत्ता को अपमानित भी करेंगी। वर्तमान उनका भले ही सुंदर बन जाए किंतु अतीत की कालिख से कालिख से से वह अपने आप को आप  नहीं बचा पाएंगे और अपना भविष्य सुंदर नहीं बना पाएंगे।

              सत्ताएँ बदलती हैं रात दिन की तरह किंतु राष्ट्र, प्रकृति  और आम जनता हमेशा बने रहते हैं । उनकी आने वाली पीढ़ियां भी उसी राष्ट्र का अंग बनेगी और अपने दामन में कलंक की कालिख लगाकर कहीं खामोशी से रहेंगे  और अपने पूर्वजों के कुकर्म पर प्रायश्चित करती रहेंगे। कोरोना एक अवसर भी हो सकता है एक संवेदनशील और विचारवान सरकारके लिए। सच्चे और मजबूत इरादों से  सीमित संसाधनों के उचित प्रयोग के सही मार्गदर्शन के साथ क्योंकि जीवन है तो सत्ता और सत्ताधारी हैं। क्या मुर्दों की कब्रों पर कभी कोई शासन करता भी है?



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