गिलानी का अचानक इस्तीफा देना कश्मीर की राजनीति का एक अहम मोड़ 
| -RN. Feature Desk - Jul 2 2020 1:09PM

-डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

हुर्रियत के अलीशाह गिलानी ने अपना इस्तीफ़ा पार्टी को थमा दिया है, यह अच्छा हुआ।कब से निष्क्रिय पड़े हुए थे।धारा 370 हटने के बाद और भी पस्त हो गए थे।उनके इस निर्णय पर कोई कुछ नहीं बोला।न मणिशंकर अय्यर,न कपिल काक और न ही यशवंत सिन्हा,डी राजा आदि।ये सभी नेता उनसे मिलने उनकी चौखट पर पहुंचते थे और गिलानी का दम्भ देखिये कि वे उनके लिये अपना दरवाजा तक नहीं खोलते थे। गिलानी के इस तरह से हुर्रियत से पल्ला झाड़ कर निकलने पर उनसे सहानुभूति रखने वाली किसी भी पार्टी का कोई बयान नहीं आया।

गिलानी 'ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’ के आजीवन अध्यक्ष रहे हैं। सैयद अली शाह गिलानी ने अपने बयान का एक ऑडियो संदेश भी जारी किया है।संदेश में गिलानी ने कहा है कि उन्होंने हुर्रियत सदस्यों को एक विस्तृत पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के भीतर वर्तमान हालात को देखते हुए, वे उससे खुद को पूरी तरह से अलग कर रहे है।

'ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’ कश्मीर में सक्रिय सभी छोटे-बड़े अलगाववादी संगठनों का एक राजनीतिक मंच है। हुर्रियत का मतलब होता है आजादी और ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस अपनी स्थापना से ही कश्मीर की आजादी की मांग करता रहा है।इस कॉन्फ्रेंस में कश्मीर से जुड़े कई अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक संगठन भी शामिल हैं।ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन 9 मार्च, 1993 को कश्मीर में अलगाववादी दलों के एकजुट राजनीतिक मंच के रूप में किया गया था। सैय्यद अली शाह गिलानी की इसमें अहम भूमिका थी। गिलानी के अलावा मीरवाइज उमर फारूक, अब्दुल गनी लोन, मौलवी अब्बास अंसारी और अब्दुल गनी भट्ट भी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना में शामिल थे। कॉन्फ्रेंस के पहले चेयरमैन के तौर पर मीरवाइज उमर फारूक ने जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद 1997 में सैय्यद अली शाह गिलानी ने इस पद को संभाला। 

आगे चलकर 2003 में गिलानी कुछ मतभेदों की वजह से मूल हुर्रियत कान्फ्रेंस से अलग हो गए थे और उन्होंने अपना नया गुट ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (जी) या तहरीक-ए-हुर्रियत बना लिया था।जबकि अभी भी दूसरे गुट ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के मुखिया मीरवाइज उमर फारूक हैं।गिलानी वाले गुट को कट्टरपंथी और मीरवाइज वाले गुट को उदारवादी माना जाता रहा है। 

गिलानी के इस्तीफे की कई वजहें हैं।दरअसल,हुआ यह है कि पाक-नियंत्रित आईएसआई इनकी कार्यशैली से खुश नहीं था, अतः इन्हें दबाव में आकर अनिच्छा से अपने को पद त्यागना पड़ा। दबाव में आकर पद ही नहीं त्यागा बल्कि इनसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान फंडिंग का हिसाब भी मांगा गया। यह तोहमत भी लगी कि गिलानी बूढ़े हो चले हैं और शायद इसी लिए 370-35A हटने के बाद वे न पत्थरबाजों की भीड़ जुटा पाए और ना ही कश्मीर में किसी तरह की हिंसा और आतंक ही फैला पाए।सेना को भीड़ रोकने के लिये गोलियां भी नहीं चलानी पड़ी जिसे आधर बनाकर पाकिस्तान दुनियाभर की सहानुभूति बटोरता।उल्टा, आतंकी एक-एक करके ढेर होते चले गए और हूरों के पास पहुंचते रहे।

माना जा रहा है कि गिलानी और उसके कार्यकर्त्ताओं को सब से बड़ी चोट पड़ी सरकार की संशोधित और सख्त कश्मीर-पॉलिसी से।इनकी लोकल फंडिंग भी रुक गयी, बैंक-अकाउंट फ्रीज़ हो गये।सुरक्षा भी हटा दी गयी।अब कोई उनसे मिलने भी नहीं जाता था।आतंकियों के जनाजे निकलने पर भी रोक लग गयी।मजमा कहाँ से लगे? ह्यूमन राइट्स वाले भी अब कश्मीर में झांकना ज़रूरी नहीं समझने लगे थे। पिछले 4 सालों से श्रीनगर के हैदरपोरा इलाके के अपने निवास-स्थान में नजरबंद गिलानी का अचानक इस्तीफा देना कश्मीर की राजनीति का एक अहम मोड़ माना जा रहा है।



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