...कब बन्द होगा मीडिया का विधवा विलाप?
| -RN. Feature Desk - Jul 11 2020 2:59PM

-रीता विश्वकर्मा

जब लग जीवे माता रोवे, बहिन रोवे दस मासा। तेरह दिन तक तिरिया रोवे, फेर करे घर बासा।। मन फूला फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे.................। कबीर दास की इन निर्गुन पंक्तियों की प्रासंगिकता पर ज्यादा कुछ न कहकर बस इतना ही कहना है कि- किसी भी व्यक्ति की मृत्यु उपरान्त किसको कब तक यानि कितनी अवधि तक कष्ट रहता है यह सब इन पंक्तियों में पूरी तरह से स्पष्ट वर्णित है। 

विलाप- यानि रोना। इस शब्द के कई मायने होते हैं। यह एक क्रिया है जो समय और वजह के चलते अपना नाम परिवर्तित करती रहती है। भूख की वजह से जब बच्चा रोता है तब माँ उसे खाने को कुछ न कुछ देती है। क्षुधा तृप्त होने पर बच्चा अपने आप रोना बन्द कर खामोशी अख्तियार कर लेता है। इस क्रिया को बच्चों का रोना कहते हैं। जिसका कोई विशेष नाम नहीं होता। 

समाज में ब्याह-शादी उपरान्त जब कन्या अपने पति के घर यानि ससुराल प्रस्थान करती है तब उस समय उसके पीहर के लोग बिछोह की पीड़ा में रोते हैं। इसका भी कोई विशेष नाम नही है। किसी की मृत्यु उपरान्त जब उसके परिजनों, हित-मित्रों द्वारा रोना शुरू किया जाता है तो इसे विलाप कहते हैं। विलाप- यानि रोना..........इस शब्द ने जो एक क्रिया है अब इस हाइटेक युग में विभिन्न नाम अख्तियार करना शुरू कर दिया है। 

रोना जैसी क्रिया मरने वाले के घर में जहाँ रूदन-क्रन्दन का माहौल उत्पन्न कर रही है वहीं सोशल मीडिया में मरने वाले/वालों के मौत के कारणों को लेकर विधवा विलाप जैसा सेनेरियो उत्पन्न होने लगा है। इसके तहत फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप्प पर पिछले कुछ महीनों से कोरोना महामारी, बॉलीवुड एक्टर्स की आत्महत्याएँ और पुलिस के साथ मुठभेड़ में ढेर किये गये अपराधियों की मौत पर विचारकों द्वारा अपने-अपने तरीके से जिस तरह के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं, या फिर आपसी नोक-झोंक हो रही है उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि ये लोग पेशेवर रूदालियों की तरह विलाप कर रहे हैं। यह विलाप चिर स्थाई न होकर अल्पकालिक है, ऐसा देखा गया है कि जिस किसी प्रकरण पर हल्ला-गुल्ला के साथ रूदन-क्रन्दन किया जाता है वह शीघ्र ही सामाप्त हो जाता है। ठीक उसी तरह जैसे किसी व्यक्ति की मृत्यु उपरान्त 13 दिन तक उसकी विधवा पत्नी रोती है, इससे कुछ अधिक अवधि तक बहन रोती है, परन्तु माँ अपने जीवन भर सन्तान शोक में डूबी रहकर रोती है। 

इस समय सोशल मीडिया में कुख्यात गैंगस्टर कानपुर वाले विकास दूबे की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत पर सोशल मीडिया के ज्ञानियों और विचारकों द्वारा जो विधवा विलाप किया जा रहा है वह अवश्य ही कहीं न कहीं समाज में एक वाद को बढ़ावा देता परिलक्षित हो रहा है। मसलन जिस तरह की बातें वर्तमान में राजनीतिक खेमों में की जाती है, ठीक उसी तरह विकास दूबे की मौत पर की जा रही है। इस समय तो विकास दूबे की मौत को लेकर गाँव और शहरों में बहसबाजी करने वाले तत्व आपस में मारपीट जैसी अप्रिय घटनाओं को जन्म देने लगे हैं। पक्षधरों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जातिवाद के चलते एक ब्राम्हण विकास दूबे का एनकाउंटर करवा दिया। बहसबाजी में विपक्ष का रोल प्ले करने वाले लोगों द्वारा इसके विपरीत तर्क देते हुए योगी सरकार की प्रशंसा की जा रही है। आज-कल एकाएक उत्पन्न हुई इस तरह का माहौल अत्यन्त दुःखद और चिन्ता का विषय है। यदि यह कहा जाये कि गाँव की मेड़ से लेकर शहरों के गली-कूचे तक में आपसी वैमनस्य कराने में सोशल मीडिया का अहम रोल है तो कतई गलत नहीं होगा। 

बीते 3 जुलाई 2020 से यह चिन्तनीय स्थिति उत्पन्न हुई है जिसका समापन यथाशीघ्र होना आवश्यक है। सर्वविदित है कि 3 जुलाई को उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर में स्थित बिकरू गाँव में 8 पुलिसजनों अपने प्राण गंवाने पड़े थे। यह दुःखद घटना उस समय हुई थी जब कानपुर चौबेपुर थाना अन्तर्गत बिकरू गाँव निवासी गैंगस्टर विकास दूबे की गिरफ्तारी के लिए पुलिस बल उक्त गाँव गई हुई थी। जहाँ विकास दूबे और उसके गुर्गों ने आग्नेयास्त्रों से गोलियाँ चलाकर पुलिस टीम के 8 कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना को भी सोशल मीडिया में प्रमुखता मिली थी और सोशल मीडिया के विद्वान विचारकों, समीक्षकों द्वारा अपने-अपने तरीके से विकास दूबे और उत्तर प्रदेश पुलिस टीम के बारे में टिप्पणियाँ की गई थी। हालांकि 3 जुलाई के तुरन्त बाद से सोशल मीडिया पर होने वाला इस तरह का विधवा विलाप समाप्त भी नहीं हो पाया था कि इसी बीच पुलिस मुठभेड़ में 10 जुलाई 2020 को कानपुर घटना का मुख्य आरोपी गैंगस्टर विकास दूबे मारा गया। 

विकास दूबे के मौत की सूचना जंगल में आग की तरह फैल गई, और फिर शुरू हो गया मीडिया/सोशल मीडिया में बहसबाजी का दौर। विकास दूबे एनकाउंटर उपरान्त इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर हल्ला-गुल्ला के साथ शुरू हुई बहसबाजी मानो आसमान टूट पड़ा हो या फिर धरती फट गई हो। सोशल मीडिया विशेष तौर पर फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर विकास दूबे एनकाउंटर पर लोगों द्वारा तरह-तरह के विचार व्यक्त किये जाने लगे। 
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को भला-बुरा कहा जाना शुरू हो गया। ब्राम्हण बनाम ठाकुर व अन्य जातियाँ जैसा माहौल उत्पन्न होने लगा। जिसे देखकर यह प्रतीत हो रहा है कि विकास दूबे का एनकाउंटर प्रदेश में एक नये सुदृढ़ जातीय समीकरण वाली राजनीति को बढ़ावा दे रहा है। इस समय जो माहौल उत्पन्न हुआ है (सोशल मीडिया के जरिये) उससे प्रतीत होता है कि अब उत्तर प्रदेश सरकार के गठन और कुशल संचालन हेतु नये मुखिया का चुनाव आसन्न है, या फिर प्रदेश में एक विप्लवकारी राजनैतिक उथल-पुथल हो सकती है। 

पढ़ा था, देखा था, सुना है कि कुख्यात विकास दुबे के एनकाउंटर उपरान्त 3 जुलाई 2020 की घटना के तत्काल बाद उसकी माँ ने कहा था कि पुलिस भी उसके वैसा ही करे, जैसा उसने पुलिस के साथ किया। विकास दूबे की खोज में सक्रिय पुलिस से फिर इसी माँ ने कहा कि पुलिस विकास की जान बख्श दे। माँ-माँ होती है..............। अन्त्य परीक्षण उपरान्त जब विकास दूबे का शव उसके परिजनों को सौंपा गया तब उसकी पत्नी रिचा ने मीडिया के समक्ष रौद्र रूप दिखाते हुए कहा कि उसके पति की हत्या की गई है, जिसका बदला लेने के लिए वह बन्दूक उठायेगी। 

खैर! विकास दूबे अब इस दुनिया में नही है। माँ पुत्र वियोग में अपने जीवन भर रोयेगी, भाई, बहन कुछ माह तक उसे याद कर रोयेंगे। और उसकी विधवा रिचा कितने दिन रोयेगी यह तो समय बतायेगा। जब माँ, भाई और पत्नी की बात चलती है तब-तब किसी की मौत उपरान्त कबीरदास की निर्गुण पंक्तियाँ बरबस याद आती हैं। 

कई प्रिन्ट मीडिया से जुड़े वरिष्ठ जनों ने कहा कि विकास दूबे के एनकाउंटर पर अपनी प्रतिक्रिया दो। निःशब्द और त्वरित जवाब न दे पाने पर उन लोगों ने कहा कि एक लेखक और पत्रकार का दायित्व बनता है कि वह स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए अपने स्वस्थ विचार रखे। ऐसा करने से संविधान में किसी भी तरह की आवश्यक तरमीम करने में आसानी होती है। साथ ही लोकतंत्रीय व्यवस्था का कुशल संचालन होता है। हम ठहरे लोकतन्त्र के चौथे खम्भे। इसलिए बहैसियत एक पत्रकार हमें निष्पक्ष भाव से सिक्के के दोनों पहलुओं की उपयोगिता लोगों के समक्ष प्रस्तुत करना हमारा दायित्व है। यही कारण है कि हम पत्रकार तटस्थ भाव से ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर सिद्धान्त पर अमल करते हुए अपनी लेखनी चलाते हैं। इस समय भी जब प्रदेश में विकास दूबे नामक कुख्यात अपराधी का पुलिस द्वारा एनकाउंटर किया गया है तब यह कितना जायज है या कानून की सीमा का अतिक्रमण है इस तरह के मुद्दे पर हमारी लेखनी खुलकर चलनी चाहिए। 

-रीता विश्वकर्मा



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