भला, छोड़ दूं कैसे
| -RN. Feature Desk - Jul 13 2020 2:18PM

                                                                                      -स्मिता जैन

पृथ्वी हूं ,
सूर्य की परिक्रमा को , भला छोड़ दूं कैसे ? 
पाती हूं जीवन तुमसे, जीवन को भला छोड़ दूं कैसे ? 
तेज से तुम्हारे ,बोती हूं नए ख्वाबों को 
पाती हूं एहसासों की फसल को
फसल को भला छोड़ दूं कैसे ? 
चलती हूं संग तुम्हारे ,
कदमों को तन्हा भला छोड़ दूं कैसे ? 
जीती हूं पल-पल की विविधता,
ऋतुयों कीभला छोड़ दूं कैसे? 
पाती हूं होली तुमसे, रंगों को भला छोड़ दूं कैसे ? 
सजते हैं सुर तुमसे, 
वीणा के तारों को भला छोड़ दूं कैसे? 
चलते हैं काफिले तुम्हारे संग 
अभिव्यक्ति को भला छोड़ दूं कैसे ? 
गूंजती है शहनाई तुमसे ,
साज को भला छोड़ दूं कैसे?
 खुशबू से तुम्हारी महकता है उपवन, 
उपवन को भला छोड़ दूं कैसे ? 
कटती है तनहाइयां तुमसे ,
संवादों को भला छोड़ दूं कैसे ? 
खनकती है चूड़ियां तुमसे 
चमकता है सिंदूर तुमसे 
महकती है मेहंदी हाथों की 
माथे की  बिंदिया को भला छोड़ दूं कैसे ? 
थिरकते हैं अरमान दिल में 
छुअन को तुम्हारी भला छोड़ दूं कैसे ? 
तुम ही बताओ अब 
पृथ्वी हूं  
सूर्य की परिक्रमा को भला छोड़ दूँ कैसे?



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