गंभीर चिंता का विषय है कोरोना से चिकित्सकों की मौत और पोजिटिव मामलों का बढ़ना
| -RN. Feature Desk - Aug 10 2020 12:54PM

-डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

भारतीय चिकित्सा संघ आईएमए का ध्यानाकर्षण और दुनिया के अन्य देशों को पीछे छोड़ते अगस्त माह के पहले सप्ताह के कोरोना संक्रमितों के आंकड़े दोनों ही गंभीर चिंता का कारण होना चाहिए। आईएमए द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार कोरोना जंग से लोगों का बचाव करते करते 200 चिकित्सक अपनी जान गंवा चुके हैं। खासबात यह कि इनमंे से अधिकांश चिकित्सक 50 से कम आयुवर्ग के हैं। हांलाकि आयुवर्ग की बात कोई मायने नहीं रखती। किसी भी आयुवर्ग के किसी भी व्यक्ति की मौत अपने आप में गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। दरअसल जिस तरह को देश में माहौल बनता जा रहा है उसके चलते चिकित्सकों, चिकित्साकर्मियों और आम आदमियों के कोरोना संक्रमण के दायरें में आने की संभावनाएं अधिक बढ़ती जा रही है।

अगस्त माह के पहले सप्ताह के आंकड़ें इसका जीता-जागता उदाहरण है। अगस्त के पहले सप्ताह में हमारे यहां 3 लाख 28 हजार 903 संक्रमण मामलों की पुष्टि हुई वहीं अमेरिका में यह आंकड़ा 3 लाख 26 हजार से कुछ अधिक तो ब्राजील में 2 लाख 51 हजार से कुछ अधिक है। भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 21 लाख को पार कर गया है। हालांकि अमेरिका के 50 लाख से अधिक के आंकड़ें या ब्राजील के 29 लाख से अधिक के आंकड़ें की तुलना में कम है पर जिस तेजी से संक्रमण के मामलें सामने आ रहे हैं वो अपने आप में गंभीर चिंता का कारण है।

दरअसल लाॅकडाउन के बाद स्थितियां तेजी से बदली है। सरकारों के लाख प्रयासांें के बावजूद सुरक्षा मानकों की पालना के प्रति आमनागरिकों में गंभीरता नहीं है तो दूसरी और आर्थिक परेशानी के कारण स्थितियां और अधिक बिगड रही है। यदि सरकारी आंकड़ों पर ही विश्वास किया जाए तो देश में मास्क नहीं, लगाने, सोशल डिस्टेसिंग की पालना नहीं करने के मामलों में लाखों की संख्या में लोगों का चालान कर करोड़ो रुपए का जुर्माना वसूला जा रहा है। राज्य सरकारें इसके आंकड़ें जारी कर रही है तो सुरक्षा मानकों के प्रति जागरुकता के लिए हर कोने में होर्डिंग या अन्य माध्यमों से अवगत कराया जा रहा है पर उसके बावजूद लोग धीरे धीरे लापरवाह होते जा रहे है।

लाखों की संख्या में जुर्माने का मतलब ही यह निकलता है कि इनसे कई गुणा अधिक लोग है जो इन मानकों की पालना नहीं कर रहे हैं। देश के किसी भी कोने के किसी भी भीड़-भाड़ वाले स्थान पर निकलेंगे तो पाएंगे कि कहने को तो मास्क लगा रखा है पर वह ठीक वैसे ही है जैसे मात्र औपचारिकता पूरी करने के लगाया गया हों। मास्क है तो नाक और मुंह खुला है व मास्क गले में लटका हुआ है। यह इस तरह की लापरवाही है जिससे सरकार लाख प्रयास कर लें पर कोरोना जैसी महामारी के फैलाव को रोकने में सफल नहीं हो सकती। इसके अलावा आवाजाही लगभग सामान्य होने से भी संक्रमण फैलने की अधिक संभावनाएं बनती जा रही है। सरकार की अपनी सीमाएं है, आर्थिक गतिविधियांें को पटरी पर लाना भी सरकार के सामने चुनौती है।

ऐसी स्थिति में गैर सरकारी संगठनों और आम आदमी की जागरुकता ज्यादा जरुरी हो जाती है। वैसे भी करना क्या है मास्क का उपयोग, सोशल डिस्टेसिंग यानी दो गज की दूरी, समय समय पर हाथ धोना और सेनेटाइजर का उपयोग, यही तो करना है। थोड़ी सी समझदारी और जिम्मेदारी कोरोना से बचा सकती है। ऐसे में हमंें स्वयं को जागरुक होना होगा। दूसरा गंभीर चिंता का कारण 200 चिकित्सकों की कोरोना के कारण मौत की है। हांलाकि आईएमए की रिपोर्ट में केवल चिकित्सकों का हवाला है इसके अलावा कोरोना वारियर्स में लगे चिकित्साकर्मियों की मौत को भी जोड़ा जाए तो यह संख्या अधिक हो जाती है।

कोरोना को लेकर चिकित्सकीय व्यवस्था को लेकर जिस तरह का देश-दुनिया में भय का वाताबरण बना हुआ है उसका एक कारण चिकित्सकों की मौत और कोरोना संक्रमण के फैलना का है। दिल्ली, जयपुर सहित देश के कई हिस्सों में कोरोना संक्रमितों द्वारा आत्म हत्या व आत्म हत्या के प्रयासों के समाचारों से इसे समझना होगा। जिस तरह से कोरोना पोजेटिव आने पर संक्रमित मरीज को कोविड सेंटर पर ले जाया जाता है उससे पूरे मौहल्ले में भय व्याप जाता है।

मरीज के ले जाते ही सेनेटाइज और उसके बाद सील करने का जो सिलसिला है उससे कोविड सेंटर पर जाने से लोग ड़रने लगे है। भले ही सोशल मीडिया पर कोविड सेंटरों पर इलाज के वीडियों भ्रामक ही हो पर वहां की व्यवस्थाओं को लेकर लोगों में निगेटिव धारणा बनने लगी है। यही कारण है कि लोग इलाज कराने से ड़रने लगे है। दूसरी और जुखाम बुखार खांसी की स्थिति में पास के डाॅक्टर के पास जाते हैं, दुर्भाग्यवश सामान्य चिकित्सकों द्वारा सुरक्षा साधनों यानी पीपीई कीट आदि का उपयोग नहीं करने के कारण वे संक्रमित हो जाते हैं। यह आई एम ए की रिपोर्ट में भी उभर कर आया है। यदि हम केरल का उदाहरण ले तो पहला मामला आते ही केरल में सभी चिकित्सकों और कार्मिकों के लिए पीपीई कीट का उपयोग जरुरी करने का परिणाम है कि केरल में इस तरह के उदाहरण देखने को नहीं मिल रहे। आज जहां तक चिकित्सकों के संक्रमण से मौत के मामलों का प्रश्न है इस तरह के मामलें तमिलनाडू, महाराष्ट्र्, गुुजरात, बिहार आदि मंे अधिक देखने मंे आ रहे हैं। ऐसे में कहीं ना कहीं चिकित्साकर्मियों की लापरवाही भी सामने आती है। कोई भी चिकित्सक हो उन्हें बिना किसी लापरवाही के पीपीई कीट सहित सभी सुरक्षा मानकों का पालन करने के प्रति गंभीर होना ही होगा।

एक बात साफ हो जानी चाहिए कि कोरोना आज-कल में जाने वाला नहीं हैं अभी हमंे लंबे समय तक इससे लड़ना है। केवल सरकार और सरकारी व्यवस्था में कमी निकालने से काम नहीं चलने वाला है। जिस तरह से संक्रमण बढ़ रहा है वह सभी को चेताने वाला है ऐसे में प्रत्येक नागरिक का दायित्व हो जाता है कि वे बचाव की उपायों के प्रति गंभीर हो, भीड़-भाड़ वाले स्थानों से दूर रहने के साथ ही सोशल डिस्टेंस और मास्क लगाने की और खास ध्यान देना ही होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लाॅकडाउन अधिक समय तक नहीं चल सकता ऐसे में हमारी समझदारी और गंभीरता ही कोरोना से बचाव में सहायक हो सकेगी।



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