बड़ी खामोशी से ‘राहत’ छिन गए हम सबसे
| -RN. Feature Desk - Aug 12 2020 1:19PM

उन्होंने बताया कि रात जागते कटी और जब सुबह फजर की अजान हुई तो मैंने अल्लाह की तरफ लौ लगाई। ऐसा लगा कि एक रोशनी उतर रही है और मुझसे कह रही है कि राहत, तुम अलग जरूर हो, लेकिन जेहादी नहीं।बस इसी घटना के बाद उन्होंने वो दो लाइनें लिख गईं. यही आज उनकी पंच लाइन बन गई है मैं जब मर जाऊं....!”.

-ऋतुपर्ण दवे

जितनी बेबाकी से वो बोलते थे, उतनी ही खामोशी से चले भी गए. सच में चले गए. पहले तो किसी को यकीन नहीं हुआ और जब यकीन हुआ तो भरोसे ने साथ छोड़ दिया. लेकिन राहत साहब को तो जैसे पूरा भरोसा था..!! मजबूरी ही सही उनका भरोसा अब हम सबके यकीन में जरूर बदल गया है क्योंकि इसी बरस 26 जनवरी की ही तो बात है जब डॉ. राहत इन्दौरी ने बस दो लाइनों में न केवल अपनी पूरी शख्सियत बयां कर दी बल्कि उतने में ही अपनी ख्वाहिशें तक भी बड़ी बेफिक्री सी लिख डाली. आज उनके चाहने वाले हर किसी को बस वही लिखा बार-बार याद आ रहा है जो अब पत्थर की लकीर बन गई है “मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पैशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना।”  

सवाल फिर वही कि क्या राहत साहब को पता था...? दरअसल इसे लिखने के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प लेकिन वो अलग वाकया है जिसने राहत साहब को अन्दर से झकझोर दिया था. उनकी जिन्दगी के 70 बरस के सफर में ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी बात पर वो बेहद परेशान थे. केरल में भटकल नाम की एक जगह है वहां का एक वीडियो राहत साहब को कहीं देखने को मिल गया. उस वीडियो में वो अपना गलत जिक्र देखकर बेहद फ्रिक्रमंद और बेचौन हो गए. दरअसल वीडियो में बोलने वाला शख्स कह रहा था कि उर्दू का एक शायर है जिसका नाम राहत इन्दौरी है और वह जेहादी है. फिर क्या था बस केवल हिन्दुस्तानी राहत साहब की परेशानी बढ़ गई . वो काफी बेचौन हो गए. उस रात वो सो नहीं पाए. वीडियो देखने के बाद अपनी बीवी, बच्चों, तमाम रिश्तेदारों और दोस्तों से पूछा कि क्या मैं वाकई जेहादी हूँ?

इसी कशमकश में कब सुबह हो गई उन्हें पता तक नहीं चला. इस वाकये का जिक्र  खुद राहत साहब ने ग्वालियर में जीवाजी विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग के ई-फेस्ट इलुमिनाती में शामिल होने के दौरान इसी साल 27 फरवरी को वहां के विद्यार्थियों से करते हुए बताया था. उन्होंने बताया कि “रात जागते कटी और जब सुबह फजर की अजान हुई तो मैंने अल्लाह की तरफ लौ लगाई। ऐसा लगा कि एक रोशनी उतर रही है और मुझसे कह रही है कि राहत, तुम अलग जरूर हो, लेकिन जेहादी नहीं।” बस इसी  के फौरन बाद उन्होंने वो दो लाइनें लिख गईं.  यही आज उनकी पंच लाइन बन गई है “मैं जब मर जाऊं....!”.

शायरी के अलावा राहत साहब गजलों की दुनिया के भी बादशाह बल्कि बेताज बादशाह रहे हैं. उनका बेहद मशहूर शेर “तूफानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो, मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो” जहां व्यवस्थाओं को आईना दिखाता है वहीं दूसरा शेर इससे भी आगे की बात कहते हुए बड़ा संदेश और सवाल उठाता है कि “हमसे पहले भी मुसाफिर कई गुजरे होंगे, कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते......” शायरी का लंबा सफर गुजारने के बाद भी राहत साहब जैसे कुछ ढ़ूढ़ रहे थे. दुनिया भर में घूमने और अपनी हुनर का डंका पिटवाने के बाद भी अधूरा सा महसूस करते थे. हजारों मुशायरों में शिरकत करने सैकड़ों गजलें, शायरी लिखने के अलावा 36 से ज्यादा फिल्मों के लिए गीत लिखने और मशहूर होने के बाद भी उनकी ख्वाहिश अधूरी थी.

वो चाहते थे कि गालिब और मीर से आगे निकल जाएं क्योंकि जब भी कुछ लिखते तो लगता कि यह तो उनसे मिलता है. असल में ये ही उनकी प्रेरणा थे जिन्हें देखकर राहत इन्दौरी ने बड़ा मुकाम तय किया थे. राहत साहब हर बार नया लिखने के बाद भी खुद अधूरा महसूस करते थे उन्हें लगता था कि नहीं इससे भी आगे उन्हें वो लिखना है जिससे उनका दुनिया में आना और शायर बनने का सफर पूरा हो सके. बस खुद से खुद की उनकी यह होड़ उन्हें सफलता दर सफलता देती गई जिससे वो उस सीढ़ियों को चढ़ते गए जिसका उनके लिहाज से कोई अंत ही नहीं है. राहत इन्दौरी की इसी प्यास ने या कहें चाह ने उन्हें उस सफर पर हमेशा गतिमान रखा जो उनकी सफलता का सबसे बड़ा राज है. 

उर्दू शायरी पर भारतीय भाषाओं का रंग उन्होंने ही चढ़ाया और शायरी का जैसे पूरा मिजाज ही बदल कर रख दिया था. जब वो कहते थे तो गंगा-जमुनी तहजीब दिखती थी. वाकई वो हर दिल अजीज थे. कभी शायरी तरन्नुम से पढ़ी जाती थी लेकिन राहत साहब ने इसका अंदाज ही बदलकर रख दिया था. वह तरन्नुमशिकन बने और बस छा गए. शब्दों की सादगी भी ऐसी कि वो अक्सर आधी शायरी कह चुप हो जाते जिसे श्रोता पूरी कर देते. श्रोताओं के मिजाज को भांपने में माहिर राहत साहब का अंदाज-ए-बयां और जिंदा दिली ने ने हर उम्र के लोगों से लोहा मनवाया. वो कहा करते थे कि जो लिख कर लाया वो रह गया अब आपका मिजाज तय करेगा कि सुनना क्या है.

अपने जाने-पहचाने अंदाज में हाथों को लहराकर वो ऐसा शमा बांधते कि बस तालियों और वाह-वाह की आवाज से मंच गूंजता रहता. वो इस उम्र में भी रोमांटिक शायरियां लिख लेते थे क्योंकि उनका मानना था कि आदमी बूढ़ा दिमाग से होता है दिल से नहीं. राहत इन्दौरी को फिल्मों में गाने लिखने का मौका 1990 में मिला जब गुलशन कुमार ने बुलाकर अपनी फिल्म के गीत लिखवाए उसके बाद महेश भट्ट ने भी उन्हें मौका दिया और सिलसिला चल पड़ा. लेकिन जल्द ही उन्हें फिल्मों के लिए गीत लिखने से ऊब हो गई और पूरा ध्यान अपनी शेरो-शायरी पर केन्द्रित कर लिया. उनके कुछ बेहद मशहूर शेरों ने देश में कई आन्दोलनों के दौरान एक तरह से अलख जगाने का भी काम किया. उनका एक शेर “शाखों से टूट जायें, वो पत्ते नहीं हैं हम, आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहो.” कुछ इसी तरह का उनका दूसरा शेर भी काफी मशहूर हुआ “आंखों में पानी रखो,

होंठों पे चिंगारी रखो, जिन्दा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो.” उनके शेर बड़े-बड़े जन आन्दोलनों के मंच पर एक तरह से नारा भी बन चुके थे जो चाहे राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी या राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी एनपीआर या फिर संशोधित नागरिकता कानून सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का मौका हो. प्रदर्शनकारियों की जुबान पर एक नारा होता था जो राहत इन्दौरी का शेर था “सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है”. राहत इंदौरी ने सबसे पहले फिल्म सर के लिए गाना लिखा था। इसके बाद उन्होंने खुद्दार, मर्डर, मुन्नाभाई एमबीबीएस, मिशन कश्मीर, करीब, इश्क, घातक और बेगम जान जैसी फिल्मों के गाने लिखे. फिल्म खुद्दार का गीत तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है तथा फिल्म मिशन कश्मीर का बुम्बरो बुम्बरो श्याम रंग बुम्बरो  आज भी हर किसी की जुबान पर गुनगुनाते हुए सुना जा सकता है. 

इन्दौर के मालवा मिल इलाके में करीब 50 साल पहले राहत साहब की एक एक पेंटिंग की दूकान थी. उस वक्त साइन बोर्ड पेंटिंग का उनका काम था. इसी से घर चलता था. बाद में उर्दू की पढ़ाई की लेकिन जल्द ही इससे उनका मन उचट गया और वह पूरा वक्त शायरी और मंच को देने लगे. 70 साल के अपने सफर में राहत साहब करीब साढ़े 4 दशकों से शेरो-शायरी कर रहे थे. उनके पिता एक कपड़ा मिल में मजदूरी करते थे. बचपन बेहद संघर्ष और तंगहाली में बीता था. राहत इंदौरी का जन्म इंदौर में 1 जनवरी, 1950 को हुआ था।

उनकी शुरुआती शिक्षा नूतन स्कूल, इंदौर में हुई थी और इसलामिया करीमिया कॉलेज, इंदौर से 1973 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। राहत साहब ने 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया था और 1985 में भोज विश्वविद्यालय से पीएचडी की. इन्दौर के  इंद्रकुमार कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर बने. उनका मानना था कि जीवन में दुख और सुख दोनों साथ चलते हैं। कमियों और खामियों के बाद मायूसी नहीं, उम्‍मीदें बरकरार रहना चाहिये। उनका मानना था कि हमें जीवन को निचोड़ना आना चाहिये, फिर देखिये जिंदगी कितना रस, खुशियां, उत्‍साह देती है।

राहत इंदौरी एक दिन पहले ही कोरोना पॉजिटिव पाए गए उसके अगले ही दिन दिल का दौरा पड़ने से वो चल बसे. उन्हें शायद अपनी मौत का अहसास था तभी तो वह डॉक्टरों से लगातार कह रहे थे कि अब ठीक नहीं हो पाउंगा. शेरों-शायरी की महफिलों की शान राहत इन्दौरी एक अजीम शख्सियत और हर दिल अजीज थे. वो शायरी में कहते थे “ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था, मैं बच भी जाता तो इक रोज मरने वाला था”.उनका अचानक यूं चले जाना यकीन से परे लेकिन हकीकत है जिस पर भले ही भारी मन से ही सही भरोसा करना होगा. 



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