नकारात्मकता व विवादों की सीढ़ियां चढ़कर शोहरत की बुलंदियाँ छूने का चस्का
| -RN. Feature Desk - Aug 31 2020 12:16PM

-तनवीर जाफ़री

                        मानवाधिकारों की रक्षा के दायरे में आने वाली 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' किसी भी व्यक्ति का एक ऐसा अधिकार है जिसके तहत वह अपनी बात किसी भी संबंधित व उचित मंच पर रख सकता है। ऐसा करने से उसकी आवाज़ सार्वजनिक होती है,उसका विस्तार होता है तथा उसे बल मिलता है यहाँ तक कि प्रायः उसका कोई निष्कर्ष भी निकलता है। परन्तु जहाँ कहीं तानाशाही होती है या कोई ऐसा शासन होता है जो अपनी प्रशंसा में तो हर तरह का झूठ-सच सुनने का शौक़ रखता हो परन्तु उसे अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं वहां आलोचकों की 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के सारे अधिकार धरे रह जाते हैं तथा उसी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' रुपी महत्वपूर्ण 'मानवाधिकार' को राजद्रोह,देशद्रोह या देश विरोधी आदि कोई भी नाम देकर या तो जेल भेज दिया जाता है या उसका मुंह बंद करने के अनेक दूसरे हथकंडे भी अपनाए जाते हैं।

परन्तु यदि सत्ता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में  नफ़रत फैलाने,धार्मिक विद्वेष फैलाने,सांप्रदायिक दंगे भड़काने,राजनैतिक लाभ उठाने जैसे विषवमन से फ़ायदा पहुँच रहा हो तो सत्ता न केवल ऐसे तत्वों,संस्थाओं व संस्थानों की इस तरह की नकारात्मक गतिविधियों की तरफ़ से अपनी आँखें मूंद लेती है बल्कि उन्हें संरक्षण भी देती है। और सत्ता की शह पाकर 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की आड़ में अनेक लोग,संस्थाएं व संस्थान नकारात्मकता व विवादों की सीढ़ियां चढ़कर शोहरत की बुलंदियाँ छूने लगते हैं। इस समय हमारे देश में तमाम लोगों को नकारात्मकता व विवादों की सीढ़ियां चढ़कर शोहरत की बुलंदियाँ छूने का ज़बरदस्त चस्का भी लग चुका है। यह 'बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा' वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।
                                                हमारे देश में मुसलमानों के विरुद्ध सुनियोजित अभियान चलने का जो सिलसिला गुप् चुप तरीक़े से चला करता था इन दिनों उसे न केवल पूरी मान्यता व सत्ता संरक्षण मिला हुआ है बल्कि ऐसे विषयों को प्राथमिकता के साथ प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। पत्रकारिता अपने वास्तविक मक़सद तथा उद्देश्यों से भटककर सत्ता के दरवाज़े पर षाष्टांग दंडवत करती दिखाई दे रही है। मुख्य धारा के अनेक टी वी चैनल खुल कर देश में सांप्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं। ज़हरीले भाषण,भावनाएं भड़काने वाली बहसें तथा इसी तरह के भड़काऊ कार्यक्रम इसी लिए पेश किये जाते हैं ताकि समाज धर्म के आधार पर विभाजित हो,जनता कोई भी फ़ैसला भावनाओं में बह कर करे तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि इसी उन्माद की शिकार जनता सत्ता से रोटी,कपड़ा,मकान रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ व भुखमरी जैसे विषयों पर सवाल पूछना बंद कर दे।
                            पिछले दिनों ऐसे ही एक पूर्वाग्रही टी वी चैनल ने 28 अगस्त की रात 8 बजे से 'नौकरशाही में मुसलमानों की घुसपैठ' नामक आपत्तिजनक शीर्षक से एक ऐसा कार्यक्रम प्रसारित करने की घोषणा की जिससे देश का बुद्धिजीवी वर्ग सन्न रह गया। दिल्ली उच्च न्यायलय ने हालांकि 28 अगस्त को ही सुबह इस कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी। परन्तु इन दो दिनों के प्रचार में ही इस चैनल व इसके स्वामी को उससे भी अधिक प्रचार मिल गया जिसकी वह उम्मीद कर रहा होगा। इस चैनल के बारे में एक बात बताता चलूँ कि मेरी जानकारी में इसके अनेक पत्रकार बिना किसी तनख़्वाह के काम करते हैं। उनके पास पत्रकारिता का ज्ञान,डिग्री,डिप्लोमा है या नहीं,वे पढ़े लिखे हैं भी या नहीं यह जानने की कोई ज़रुरत नहीं होती बल्कि उनके पास टी वी कैमरा और वाहन होना ही उनकी सबसे बड़ी योग्यता होती है। इस चैनल से जुड़े एक ऐसे पत्रकार को मैं भी जानता हूँ जो अनपढ़ होने के अलावा अव्वल दर्जे का ब्लैक मेलर भी है। वह अपने इसी बदनाम टी वी चैनल का माइक दिखा कर अनेक लोगों से पैसे वसूलता रहता था। क़स्बे के शरीफ़ लोगों से लेकर सट्टे वालों तक से वसूली करता था। और आज वही 'टी वी पत्रकार' क़त्ल के इलज़ाम में सज़ायाफ़्ता मुजरिम के रूप में जेल की सलाख़ों के पीछे है। वैसे भी यह टी वी चैनल अफ़वाह फैलाने,झूठी ख़बरें प्रसारित करने तथा हिंसा भड़काने जैसे कई मामलों में कुख्यात रहा है तथा इसपर पहले भी कई मुक़द्दमे चल रहे हैं।
                          यह देश और दुनिया का अकेला टी वी चैनल है जिसके पत्रकार हाथों में शस्त्र लेकर अपनी बहादुरी का परिचय देते हैं। केवल सांप्रदायिकता फैलाने वाले इस टी वी चैनल का संपादक अपनी कार्यालय की जिस फ़ोटो को बार बार गर्व के साथ शेयर करता है उसकी पृष्ठ भूमि में छत्रपति शिवाजी महाराज आदम क़द चित्र में नज़र आते हैं। इसका अर्थ है कि वह शिवजी को अपना आदर्श पुरुष या प्रेरणा स्रोत मानता है। परन्तु यदि हक़ीक़त में उसने शिवाजी के जीवन चरित्र के बारे में पढ़ा होता तो न तो वह सांप्रदायिक होता न ही अपने चैनल को समाज को धर्म के नाम पर विद्वेष फैलाने का माध्यम बनाता। आज अपने जिस चैनल के माध्यम से जिन मुसलमानों के सिविल सेवा में चयन को 'घुसपैठ' बता रहा था व उन्हें जिहादी जैसे शब्दों से नवाज़ रहा था उन्हीं मुसलमानों पर वीर शिवाजी सबसे अधिक विश्वास करते थे। शिवाजी के जासूस मुसलमान थे। उनके कई प्रमुख सेनापति मुसलमान थे। उनके सलाहकार व गुप्त दस्तावेज़ देखने वाले व उनका जवाब तैयार करने वाले सभी मुसलमान थे। यहाँ तक कि  शिवाजी मुस्लिम संत फ़क़ीरों के प्रति सच्ची व गहरी श्रद्धा रखते थे। परन्तु इस चैनल के स्वामी व संपादक ने या तो शिवाजी को पढ़ा नहीं या जान बूझकर अपने आक़ाओं को ख़ुश करने व विवादों में घिरकर शोहरत की बुलंदियाँ हासिल करने की फ़िराक़ में उन मुसलमानों को संदिग्ध बनाने व बताने का 24X7 प्रयास करता रहता है जिन्होंने न केवल अपने देश की आज़ादी में अपना बहुमूल्य योगदान दिया बल्कि आज़ादी से लेकर अब तक देश को आत्मनिर्भर व सुरक्षित बनाने में भी अपनी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभाई है।
                         यह हमारे देश व देशवासियों का दुर्भाग्य है की आज समाज में इस तरह के नाकारे,सांप्रदायिक व शुद्ध व्यावसायिक प्रवृति के लोग मीडिया,राजनीति तथा अन्य कई क्षेत्रों में प्रवेश कर चुके हैं जिन्हें अपनी संस्था व संस्थान की नैतिक ज़िम्मेदारियों की क़तई परवाह नहीं है। दरअसल इन्हें नकारात्मकता व विवादों की सीढ़ियां चढ़कर शोहरत की बुलंदियाँ छूने का चस्का लग चुका है जो देश की एकता व अखंडता तथा सामाजिक व सांप्रदायिक सद्भाव के लिए बेहद घातक है। ऐसे टी वी चैनल्स को प्रतिबंधित किया जाना
चाहिए।



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