मुद्दा कश्मीर का 
| -RN. Feature Desk - Sep 1 2020 1:09PM

-डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

कश्मीर-मुद्दे को हर हाल में चर्चा में रखने,उसे आम कश्मीरियों के हित में कम और अपने हित में ज्यादा भुनाने तथा अपनी डफली,अपना राग अलापने का कश्मीरी नेताओं का चलन आज का नहीं,बहुत पुराना है।काम-धाम छिन गया,सत्ता-सुख लुट गया।नेता लोग करें तो क्या करें! दरअसल, श्रीनगर के गुपकार-रोड स्थित फ़ारूक़ अब्दुल्ला के निवास पर 4 अगस्त, 2019 को राज्य के राजनीतिक दलों की बैठक हुई थी, जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर के संविधान, अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35 'ए' और कश्मीर की पहचान को हर हाल में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया जाएगा। भनक लगते ही अगले दिन यानी 5 अगस्त २०१९ को केंद्र सरकार द्वारा एक निर्णायक कदम उठाया तथा राज्य का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया गया और तमाम बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया।शांति बनाये रखने के लिए जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में सुरक्षा-कर्मी तैनात कर दिए गए और पूरे राज्य में लॉकडाउन लगा दिया गया।(कोविड-१९ के लॉकडाउन ने स्थिति को और नियंत्रित किया।)

इधर, देश के अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तरह ही जम्मू कश्मीर में भी मुख्यमंत्री के अधिकारों को सीमित कर दिया गया।यूटी बनाए जाने के एक साल बाद केंद्र सरकार ने नया गजट जारी कर दिया।गजट की अधिसूचना के खंड पांच के मुताबिक़ लोक-व्यवस्था, पुलिस, अखिल भारतीय सेवाओं संबंधी अधिकार उपराज्यपाल को प्रदान किए गए हैं।पुलिस महानिदेशक और मुख्य-सचिव नियुक्त करने के अधिकार भी मुख्यमंत्री से वापस ले लिए गए हैं। आईपीएस औेर आईएफएस अधिकारियों के तबादले भी उपराज्यपाल राज्य के मुख्यसचिव से मंत्रणा करने के बाद करेंगे। इस संबंध में राज्य की राजनीतिक सरकार या केबिनेट के पास कोई अधिकार नहीं रह जाएंगे।इन सारी तकलीफदेह कारवाइयों से कश्मीर के स्वयम्भू नेताओं का बिफर जाना स्वाभाविक है।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और जम्मू-कश्मीर मामलों के प्रभारी राम माधव ने अपने कश्मीर दौरे के दौरान ‘गुपकार घोषणा’ को पलेबीसाइड फ्रंट/घोषणा से कम नहीं बताया है।उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान कश्मीर के राजनीतिक माहौल की समीक्षा करते समय यह बात कही।1953 से पहले जम्मू कश्मीर में वजीर-ए-आला मुख्यमंत्री और सदर-ए-रियासत राज्यपाल हुआ करते थे ।शेख अब्दुल्ला वजीर-ए-आला और डा० कर्ण सिंह सदर-ए-रियासत होते थे। स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चलाए गए आंदोलन के बाद ये पदनाम क्रमशः मुख्यमंत्री और गर्वनर में बदल दिए गए।हालांकि कश्मीर के लिए स्वायत्ता की मांग जोर-शोर से उठी मगर इस मांग को भी केंद्र की सरकार ने दरकिनार कर दिया।राज्य के लिए और अधिकारों और विशेष दर्जा देने की मांग पर केंद्र सरकार ने अंकुश लगा दिया और गजट जारी कर दिया।

जम्मू-कश्मीर पूरी तरह से भारत का एक अभिन्न अंग है।जो भी व्यक्ति या नेता संविधान के दायरे से हटकर कुछ सोचता या करता है, तो यह उसकी कश्मीर को भारत से अलग करने की अलगाववादी सोच का परिचायक ही माना जाएगा।सारा देश एक संविधान से चल रहा है,तो फिर कश्मीर के लिए दूसरा संविधान या नियम क्यों?काश,पहले से ही पूर्ववर्ती सरकारों ने कश्मीर मसले को समझदारी के साथ हल करने के साथ-साथ कुछ कठोर उपाय किये होते तो आज हालत दूसरे होते।



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