21 वीं सदी के भारत की शिक्षा संस्कृति
| -RN. Feature Desk - Sep 3 2020 5:54PM

-स्मिता जैन

15 अगस्त  1947 को आज़ाद भारत सपने देख रहा था । अपने नव निर्माण का निर्मित करना चाहता था ।विश्व स्तरीय कीर्तिमान अपने विकास का हजारों सालों की गुलामी के अंधेरों से निकलकर अपने स्वछंद आकाश में उड़कर पंछी की भाँति आजादी को अपने पंखों की उड़ान से महसूस करना चाह रहा था। रक्तपात ,आंदोलनों और विनाश से उपजे आक्रोश और अवसाद के बाद सूरज की उद्दीप्त हो रही किरणों के साथ बढ़ना चाह रहा था । अपनी उनींदी से आंखों  मे नv निर्माण का सपना समाँकर उसे साकार करनेकी तीव्र उत्कंठा के साथ अपने समाज को, देश को विकसित करना चाह रहा था। 

कृषि और लघु उद्योग आधारित देश में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों और कल कारखानों का जाल बिछाया जा रहा था ।युवाओं में  जोश गुलाटी मार रहा था। इन कारखानों के के संचालन और नव निर्माण हेतु सामाजिक शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के ज्ञानार्जन के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयोग शिक्षा में किए जाने लगे ताकि हम देश को विश्व स्तरीय रूप में आगे ला सकें । इसमें अक्षर ज्ञान ,भाषा ज्ञान ,विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित ज्ञान को महत्त्व दिया जाने लगा। अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे पास कोई नई शिक्षा पद्धति विकसित ना होने के कारण लॉर्ड मैकाले की मैकाले की शिक्षा पद्धति का अनुसरण किया जाने लगा अंग्रेजी शासन की समाप्ति के समय देश में मात्र 247 अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का संचालन था। तत्पश्चात भारतीय विचारकों को संभवत अंग्रेजी भाषा को अधिक महत्व देकर उसी भाषा में पाठ्यक्रमों का संचालन किया जाने लगा किंतु हमारी मातृभाषा को भी सम्मान के साथ उपयोग किया जा गया जिसके परिणाम स्वरूप भारत में कई महान वैज्ञानिक, शिक्षक, गणितज्ञ ,चिकित्सक, इंजीनियर ,सिविल सेवा के प्रशासनिक अधिकारी आदि ना केवल भारत को बल्कि विश्व को दिए।

इसी के परिणामस्वरूप देश इतना सशक्त बना कि विश्व में अपनी सांप -सपेरों की और जादू- टोंनों की छवि को छोड़कर विश्व स्तरीय प्रतिभा के लिए जाना जाने लगा। आज हर पांच व्यक्तियों पर एक भारतीय अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित कर रहा है और श्रेष्ठ जीवन यापन कर रहा है। लेकिन हाल के कुछ 6-8 वर्षों में भारतीय प्रतिभा अब बेरोजगारों की फौज और मजदूरों के झुंड में बदलती जा रही हैं । यह वह पीढ़ी है  जिसके लिए उसके माता-पिता ने हर सुविधा दी चाहे वह महंगी फीस हो,किताब  -कापियां, आवागमन के साधन, हॉस्टल सुविधा आदि को बहन किया और अपने बच्चों को श्रेष्ठ शिक्षा प्रदान की। 

स्कूल कालेजों ने भी श्रेष्ठ इंफ्रास्ट्रक्चर ,शिक्षक और मार्गदर्शन देने की पर्याप्त कोशिश की । इसी का परिणाम था कि देश में बड़े-बड़े औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, मेडिकल कॉलेज ,कंप्यूटर कॉलेज, फार्मेसी ,इंजीनियरिंग ,प्रवंधन  ना जाने कितने क्षेत्रों में शिक्षण कार्य सतत रूप से चल रहा था क्योंकि छात्रों को पता था कि पढ़ने के बाद हमें देश या विदेश में जॉब जरूर मिलेगी या हम आत्मनिर्भर बनकर अपना काम शुरू करेंगे किंतु आजकल कुछ वर्षों से मात्र बेरोजगारी नजर आ रही है या शिक्षित युवा मजदूरों से  भी कम सैलरी पर अपने आत्म सम्मान की खातिर काम कर रहा है । तीन-चार वर्षों से सरकारी नौकरियों में वैकेंसी का जैसे अभाव आ गया है। या तो बेरोजगारों से फॉर्म भरवा कर सरकारें अपनी आमदनी कर रहे हैं या परीक्षा जैसे तैसे हो भी जाती है तो नौकरी नहीं दी जा रही है।

अब जॉब पाने के लिए आपकी बौद्धिक क्षमता नहीं बल्कि आप के लिफाफे में कितना वजन है यह देखकर जॉब दिये जा रहे हैं । आपसे नेता या अधिकारियों के बीच  कितनी जुगाड़ है यह देखा जा रहा है। बचपन से छात्रों को नैतिकता का और ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है लेकिन जब वह फील्ड में काम पर आता है तो अनैतिकता और बेईमानी से धन कमाए जाने के लिए मजबूर किया जाता है। उसे अपने ही अस्तित्व को बचाये रखने के लिए अपने ही ईमान को बेचना पड़ता है या उसकी हत्या करवा दी जाती हैं। पढ़ते थे कभी की शिक्षित व्यक्ति समाज में सम्मान का पात्र था किंतु आज ज्यादातर युवा नशा ,अपराध, आतंकवाद में फस कर खुद को और देश दुनिया को नुकसान पहुंचा रहा है और सरकारें हथियारों  का काफिला बढ़ाने में लगे हुए हैं। 

क्या हथियारों के काफिले से हम एक शांत, सभ्य और विकसित समाज की आशा कर सकते हैं जबकि हथियार तो आक्रोश को दबाने और कुचलने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। लेकिन देश में अब छात्रों के कॉलेज, विश्वविद्यालयों में गुंडों को भेजकर प्रायोजित हिंसा हमारे  चंद मौकापरस्त लोगों के द्वारा कराई जा रही है। छात्रों को नौकरी जाने के लिए जहां स्थापित उद्योग धंधे, कल कारखाने आदि को या तो बंद किया जा रहा है या निजी करण के द्वारा धन्ना सेठों या सत्ता धारियों को दिया जा रहा है। जहां वह मात्र एक मजदूर की तरह होगा और श्रमिक की तरह कार्य कराया जाएगा वह इंसान ना होकर शोषित होगा। कभी ईस्ट इंडिया कंपनी और अन्य आक्रांताओं ने  भारतीय युवा को दास बना कर रखा था किंतु आज तो हम 21वीं सदी में उन्नत तकनीक के साथ अपनी चुनी हुई सरकारों के मार्गदर्शन में जी रहे हैं । अगर यही सरकारें हमारे युवा के साथ वहीं दासत्व को  दोहराएं तो उस देश का क्या होगा ,क्या करें तरक्की करेगा?

शासक यह सोच कर भले ही खुश हो जाए की मेरी राजनीति श्रेष्ठ है । मेरा विश्व में एक खास स्थान है लेकिन क्या वह अपने ही देशवासियों से नजर मिला कर अधिकार पूर्वक बात कर पाएगा। इन सारी परिस्थितियों से यही आकलन लगाया जा सकता है कि बहुत हो गई पढ़ाई लिखाई । जो कोई सुरक्षित भविष्य ना दे सकें उसे ग्रहण करना चाहिए भी या नहीं। क्या अब भारत विश्व स्तर पर पुनः अपनी भारतीय  प्रज्ञा के झंडे गाड़ पाएगा या मात्र अंध भक्तों की तरह गुलाम मानसिकता के साथ रहने के लिए समझौता कर लेगा। वर्तमान शिक्षा पद्धति में परिवर्तन से रोजगार आने वाले 25 से 30 वर्षों में प्राप्त होगा किंतु वर्तमान में जो युवा भारत बेरोजगार रहकर बूढ़ा हो रहा है उसका कोई समाधान तो होना ही चाहिए। क्या वह सत्ता  के द्वारा गुमराह करके अपनी जवानी यूँ ही खो देगा । हमें वर्तमान में मजबूत भारत और आत्मनिर्भर भारतीय समाज चाहिए ना कि भविष्य के मुंगेरी सपने क्योंकि राष्ट्रीय नीतियां वर्तमान में भविष्य के लिए निर्मित हो रही हैं। क्या वर्तमान भूतकाल ही बन गया है जो इसे उपेक्षित किया जा रहा है? क्या इस युवा वर्ग के कोई सपने, आकांक्षाएं और जरूरत नहीं है? सत्ता कब तक उन्हें बेहोश रखकर अपनी रोटियां सेंकती रहेगी?



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