दर्शकों की संवेदनाओं से खेलकर अर्थ-लाभ कमाने वालों को दिखाना होगा आइना
| Rainbow News - Jun 25 2017 3:03PM

रंगमंच को लोकप्रियता की ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक

-रवीन्द्र अरजरिया/ जीवन में सम्बन्धों की स्थापना के लिए विचारों के सम्प्रेषण की महात्वपूर्ण भूमिका होती है। शब्दों के साथ जब भावाभिव्यक्ति जुड जाती है तब सोने में सुगन्ध की कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगती। अनन्त काल पहले हुए यह अभिनव प्रयोग लम्बे समय से हमारे जीवन का अभिन्न अंग बने हुए हैं। वर्तमान जीवन के कथानकों को इच्छित दिशा देकर वातावरण निर्माण करने वाले संचार माध्यमों से लक्ष्य पूर्ति में लगे हैं। साइबर युग के बहुआयामी संसाधनों से लेकर पुरातन परम्पराओं तक का व्यवहारिक स्वरूप आज लोकप्रियता के ग्राफ में अपना महात्व दर्शा रहा है। पारिवारिक धारावाहिकों की लम्बी सूची के मध्य सांस्कृतिक मूल्यों को तलाशना बेहद कठिन हो गया है।

बडे पर्दे, छोटे पर्दे के अलावा नेट कल्चर ने तो रही सही कमी भी पूरी कर दी है जिसे मोबाइल जैसा बहुउद्देश्यीय यंत्र पूरी ताकत से फैलाने में लगा है। ऐसे में वास्तविकता के नजदीकियां रखने वाला रंगमंच कही खो सा गया है। रामलीला, ऐतिहासिक घटनाओं के  प्रेरणादायक प्रसंग, सामाजिक व्यवस्था पर चोट करने वाली पटकथायें भी पर्दे के सामने के तकनीकी सम्पन्नता के साथ कथित ठेकेदारों की मंशा के अनुरूप सामने आ रहीं हैं। लाइट, साउण्ड, कैमरा, एक्शन, कट की गूंज के साथ किसी को भी प्रतिभाशाली अभिनेता बनाकर प्रस्तुत करने वाले स्टूडियो ने गांव की चौपालों से लेकर महानगरों के आडीटोरियमों तक पर कब्जा कर लिया है। सोच चल ही रही थी कि कालबेल के मधुर संगीत ने किसी आगन्तुक की सूचना दी। दरवाजा खोला तो सामने रंगमंच के प्रतिभाशाली व्यक्ति को अभिवादन की मुद्रा में खडे पाया जो शिवेन्द्र शुक्ला के नाम से अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। उनके हाथ में ताजे फूलों के गुलदस्ते के साथ एक आमंत्रण था जिसे वह हमें देने के लिए आये थे। इसके पहले कि वह अपनी व्यस्तता का बखान करते हुए तत्काल जाने की अनुमति मांगते, हमने नौकर को दो कप चाय लाने के लिए आवाज लगा दी। उन्होंने मुस्कुराते हुए हमारी मंशा का सम्मान किया और अंदर सेंटर हाल में रखे सोफे पर आसन जामा लिया। आमंत्रण पत्र पर महाराज छत्रसाल स्मृति शोध संस्थान की प्रस्तुति के रूप में ऐतिहासिक नाट्य मंचन महाबली छत्रसाल अंकित था।

संस्थान के राधे शुक्ला, भगवत अग्रवाल, विनय चौरसिया आदि की सक्रियता का परिणाम सामने था। मन में चल रहे विचार मंथन के साथ जुडे इस तारतम्य को आगे बढाते हुए हमने शिवेन्द्र से रंगमंच को समर्पित उनकी निष्ठा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानने की कोशिश की। छत और छत पर लगे पंखे को घूरते हुए वे अतीत की गहराइयों में कङीं खो गये। उन्हें अपना स्वरूप कक्षा 3 के छात्र के रूप में नजर आने लगा जब वे सरस्वती शिशु मंदिर पृथ्वीपुर में अध्ययनरत थे तब अध्यात्म के धरातल पर खडे प्रेरणादायक नाटक मूरतध्वज में उन्होंने महात्वपूर्ण भूमिका दी गई थी। तब से लेकर सन् 2001 तक के एनएसडी आवासीय कार्यशाला पन्ना तक की यादें ताजा हो उठी। हमने उन्हें अतीत की गहराइयों से बाहर निकलकर रंगमंच के व्यक्तिगत प्रयासों के आधार पर खडा किया। कार्यशाला के बाद किस्सा कल्पनापुर का, के मंचन को पहली सीढी निरूपित करते हुए उन्होंने कहा कि अपने व्यक्तिगत स्तर पर संघर्ष की इबारत बुंदेलखण्ड के छतरपुर से लिखना शुरू हुई। प्रायोजक के द्वारा कार्यक्रम के ठीक पहले हाथ खडे कर दिये।

शहरवासियों से 10 रुपये से लेकर 100 तक का सहयोग मांग कर उस नाटक को मंच देने की सफलता मिलने के बाद फिर पीछे मुडकर नहीं देखा। मंचीय सफलताओं ने पलायन अब और नहीं नामक फिल्म में नकारात्मक भूमिका दिलवायी। हमने उन्हें बीच में ही टोकते हुए वर्तमान समय में नाटक की जटिलताओं, दर्शकों की सीमित रुझान और प्रायोजकों की कमी की ओर उनका ध्यानाकर्षित किया। यह सत्य है कि रंगमंच से दर्शकों तक सीधे पहुचने वाले कलाकारों के पास कट-पेस्ट की फिल्मी सुविधा नहीं होती। शतप्रतिशत सफल होना ही होता है। लाइट, साउण्ड, सह-कलाकारों के सहयोग को स्थापित रखते हुए स्वयं की भूमिका को जीवित करने की कठिन परीक्षा से गुजरना सहज नहीं होता। इसीलिए तो रंगकर्मी किसी साधक से कम नहीं होते उन्हें अपनी कला को ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए तपस्या करना पडती है। रही बात दर्शकों के रुझान की तो भौतिकवाद की चरम की ओर कुलाचें भरते युग में सुख के साधन जुटाने में लगी मानवीय काया शार्टकट का रास्ता चाहती है परन्तु प्रतिभा का लोहा दूर तक चोट करता है यह भी सोलह आने सच है। आर्थिक कठिनाइयों के अन्तः में दर्शकों की मनोभूमि ही है जिससे प्रायोजकों की बेहद कमी होती जा रही है। ऐसे में सरकारी संरक्षण के बिना रंगमंच को लोकप्रियता के ग्राफ में ऊंचाइयों तक पहुंचाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की महती आवश्यकता है।

ज्वलंत सामाजिक विषयों से हटकर अतीत की स्मृतियां ताजा करने के विषय पर उन्हें टटोला। इतिहास को सामने रखे बिना वर्तमान में भविष्य के निर्धारण की कल्पना अनर्गल प्रलाप से अधिक कुछ नहीं होगा। दर्शकों की संवेदनाओं से खेलकर अर्थ-लाभ कमाने वालों की मानसिकता से दूर हम सांस्कृतिक विरासत को बचाने में लगे हैं ताकि आने वाला कल हमें दायित्वविहीन न कह सके। इसी के साथ शिवेन्द्र की आंखें नम हो गई। गला रुंध सा गया। शब्द भर्रान लगे। हमने अनजाने में ही उनकी भावनाओं को बहुत अंदर तक कुरेद दिया था। वातावरण शांति के आगोश में चला गया था। तभी नौकर ने आकर टेबिल पर चाय के प्यालों के साथ नमकीन, बिस्कुट की प्लेटें सजा दीं। हमने खामोशी से चाय पी और फिर उन्होंने उसी तरह सम्मानजनक अभिवादन के साथ विदा मांगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।  

 

 



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