कश्मीरी भाषा के लिए देवनागरी लिपि 
| -RN. Feature Desk - Sep 21 2020 1:39PM

-डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

आज से लगभग छह सौ वर्ष पूर्व कश्मीरी भाषा शारदा लिपि में लिखी जाती थी। चौदहवीं शताब्दी के आसपास फारसी कश्मीर की राजभाषा बनी तो कश्मीरी के लिए फारसी लिपि का प्रयोग बढ़ने लगा। इन दिनों इसी लिपि का तनिक परिवर्तन/ परिवर्धन के साथ प्रयोग होता है और इसे (पर्शियो-अरेबिक) ‘नस्तालिक’ लिपि के नाम से जाना जाता है। इस लिपि को राजकीय मान्यता भी प्राप्त है। कश्मीरी के अधिकतर धार्मिक और कर्मकांड संबंधी बहुमूल्य ग्रंथ या शास्त्र शारदा में ही लिखे गए हैं।

शारदा लिपि लिखने का तरीका देशी था जो मूल ब्राह्मी से विकसित हुआ था। वैसे, शारदा ब्राह्मी का ही कश्मीरी संस्करण है। इस लिपि का प्रयोग कश्मीरी पंडित (पुरोहित वर्ग) द्वारा जन्मपत्री लिखने के लिए भी किया जाता रहा है। वैसे, कश्मीरी भाषा के लिए शारदा के अलावा देवनागरी, रोमन आदि लिपियों का प्रयोग भी होता रहा है। कश्मीरी भाषा/ लिपि के अब सॉफ्टवेयर भी आ गए हैं। कश्मीरी को देवनागरी में लिखने के सफल प्रयोग हुए और हो रहे हैं। कश्मीरी को देवनागरी में लिपिबद्ध करने का श्रेय सर्वप्रथम श्रीकंठ तोषखानी को जाता है।

इसके बाद जियालाल कौल जलाली और पृथ्वीनाथ पुष्प ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए। देवनागरी की यही एक बड़ी विशेषता है कि वह किसी भी भाषा को सफलतापूर्वक लिपिबद्ध करने में सक्षम है।कश्मीरी के लिए नागरी लिपि के प्रयोग में थोड़ी-सी कठिनाई पेश आती है। इसकी ह्रस्व अ, उ, ओ, ए और दीर्घ आ, ऊ आदि संबंधी ध्वनियां स्पष्ट रूप से देवनागरी में अंकित नहीं हो पातीं। लेकिन इसके लिए यदि निर्धारित मात्रा-चिह्नों का उचित ढंग से प्रयोग किया जाए तो यह समस्या काफी हद तक सफलतापूर्वक सुलझ जाती है।

इसी प्रकार कश्मीरी के विशिष्ट ध्वनियों वाले तीन व्यंजनों मसलन च, छ और ज के लिए भी डैश/बिंदी/नुक्ते का संकेत-चिह्न काम में लाया जा सकता है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भुवन वाणी ट्रस्ट, भारतीय भाषा संस्थान आदि ने कश्मीरी के लिए कश्मीरी-देवनागरी वर्णमाला प्रस्तावित/तैयार की है और कुछ रचनाएं देवनागरी में प्रकाशित भी हुई हैं। आज जब कश्मीर से पंडितों का बड़ी संख्या में विस्थापन हो गया है और वे देश के अलग-अलग कोनों में जाकर बस गए हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि अपनी संस्कृति/साहित्य आदि को अक्षुण्ण रखने के लिए वे साहित्य-रचना के लिए देवनागरी लिपि का अधिकाधिक प्रयोग करें।

हिंदी-संस्कृत का ठीक-ठाक ज्ञान हर कश्मीरी पंडित को है और इस दृष्टि से देवनागरी लिपि में लिखना उसके लिए कठिन नहीं होगा। लिखने-छपने के लिहाज से भी देवनागरी कश्मीरी भाषा के लिए सर्वथा अनुकूल लिपि है। कश्मीरी भाषा के लिए विकल्प के तौर पर देवनागरी लिपि के प्रयोग पर इन दिनों  विचार-मंथन चल रहा है। कई साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं ने पहल करते हुए सरकार और उच्च अधिकारियों को इस बारे में ज्ञापन भी दिए हैं। कश्मीरी के लिए देवनागरी लिपि के प्रयोग को लेकर मैं विगत तीस वर्षों से प्रयासरत रहा हूँ।

विद्वान लोग जहाँ कश्मीरी के लिए सम्भावनाएँ ही तलाशते रहे,वहाँ मैं ने कर के दिखा दिया कि कैसे देवनागरी लिपि में कश्मीरी को लिखा जा सकता है।सन् 1965 में जम्मू व कश्मीर प्रदेश की कल्चरल अकादमी ने कश्मीरी की लोकप्रिय रामायण ’रामावतारचरित’ को ‘लवकुश-चरित’ समेत एक ही जिल्द में प्रकाशित किया था। कश्मीरी नस्तालीक लिपि में लिखी 252 पृष्ठों की इस रामायण का संपादन/परिमार्जन का कार्य कश्मीरी-संस्कृत विद्वान् डॉ0 बलजिन्नाथ पंडित ने किया है। मैंने इस बहुचर्चित रामायण का भुवन वाणी ट्रस्ट, लखनऊ के लिए सानुवाद देवनागरी में लिप्यंतरण किया है।

इस कार्य को करने में मुझे पाँच वर्ष लगे और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि यह कार्य मैं ने श्रीनाथजी की पावन नगरी नाथद्वारा में पूरा किया।481 पृष्ठों वाले इस अनुपम ग्रन्थ की सुन्दर प्रस्तावना डा0 कर्ण सिंह जी ने लिखी है और इस श्रमसाध्य अनुवाद-कार्य के लिए 1983 में बिहार राजभाषा विभाग, पटना द्वारा मुझे ताम्रपत्र से सम्मानित भी किया गया।कश्मीरी की प्रसिद्ध कवयित्री ललद्यद (14वीं शताब्दी) के वाखों का भी मैं ने सानुवाद देवनागरी में लिप्यंतरण किया और इस ग्रन्थ को भी भुवन वाणी ने छापा है।इस पुस्तक की प्रस्तावना हिंदी जगत के प्रसिद्ध विद्वान और पत्रकार बनारसीदास चतुर्वेदीजी ने लिखी है।



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