खेती-किसानी : नकद की जगह आदान वितरण से बदलेगी अन्नदाता की तकदीर
| -RN. Feature Desk - Sep 28 2020 1:37PM

-डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

कृषि लागत और मूल्य आयोग ने पहली बार केन्द्र सरकार को ख्श्हााद अनुदान की राशि सीधे किसानों को उनके खातों में उपलब्ध कराने का सुझाव दिया है। हांलाकि इससे पहले इस आयोग द्वारा कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों का ही सुझाव प्रमुखता से दिया जाता रहा है। यह सुझाव इस मायने मंे महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह राशि सीधे किसान के पास जाएगी। आयोग ने सुझाव दिया है कि खाद अनुदान के रुप में यह राशि रबी और खरीफ फसल के लिए 2500-2500 रु. के अनुसार दो किस्तों में किसानों को दी जाए। सरकार द्वारा किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को छह हजार रु. प्रतिवर्ष की राशि भी दी जा रही है। हांलाकि किसानों के लिए इस तरह साल भर में ग्यारह हजार रुपए मिलना बड़ी राहत होगी। निश्चित रुप से इससे किसानों को बड़ा संबल भी मिलेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह अपने आप में अच्छा सुझाव है और सरकार किसानों की आय दोगुणी करने के लिए संकल्पित है तो उस दिशा में यह अग्रगामी कदम भी माना जा सकता है।

पिछले कुछ सालों से सरकारें चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की, किसानों के प्रति संवेदनशील हो रही है। भले ही इसे वोट बैंक का कारण माना जाए। कोरोना ने खेती-किसानी के महत्व को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। सरकारों को अब लोक लुभावन घोषणाओं के स्थान पर खेती-किसानी के लिए कुछ खास करना ही होगा। केन्द्र सरकार के किसानों के लिए लाए गए तीन विधेयकों को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचना और राजनीतिक प्रतिवद्धता के कारण अलग अलग राय हो सकती है पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अब समय आ गया है जब अन्नदाता की समस्या को समझना ही होगा। सरकारों द्वारा चुनावों के समय जिस तरह से कृषि ऋण माफी की घोषणाएं की जाती है वह किसानों या यों कहें कि खेती-किसानी की समस्या का स्थाई हल हो ही नहीं सकता। हांलांकि खाद अनुदान राशि और सम्मान निधि को देने का जो तरीका है उसको लेकर विचार किया जाना अभी भी आवश्यक है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की सहायता किसानों को अवश्य दी जानी चाहिए पर यदि खेती किसानी को बढ़ाना है और वास्तव में किसानों के भले के लिए सरकारें गंभीर है तो उसका सबसे बेहतर तरीका नकद राशि चाहे वह सीधे खातें मेें स्थानांतरित हो रही है उसके स्थान पर सरकार को आदान के रुप में उपलब्ध कराने से इसका सीधा सीधा लाभ अधिक प्रभावी तरीके से किसान और देश को प्राप्त होगा।

भले ही सरकार राशि की सीमा यहीं रखे पर इस राशि की सीमा तक किसानों को उसकी मांग के अनुसार खाद-बीज उपलब्ध कराए जाते हैं तो उसका वास्तविक लाभ मिल सकेगा। खाद-बीज मिलेगा तो किसान सीधे सीधे इनका उपयोग खेत में करेगा और उससे निश्चित रुप से उत्पादन बढ़ेगा। और इस उत्पादन बढ़ने का फायदा प्रत्यक्ष रुप से किसान और देश दोनों को होगा। देखा जाए तो किसानों के साथ खाद-बीज को लेकर अधिक ठगी होती है। नकली या घटिया बीज मिलने से किसान की पूरी मेहनत पानी में फिर जाती है। ऐसे में सरकार यह सुनिश्चित कर लें कि किसानों को जो भी बीज उपलब्ध कराए जाएंगे व उच्च गुणवत्ता के साथ ही उनमें रोगनिरोधक क्षमता हो। इससे दोहरा लाभ होगा। किसानों को समय पर मांग के अनुसार बीज मिल जाएंगे तो दूसरी और उनकी प्रमाणिकता व गुणवत्ता मेें कोई संदेह नहीं रहेगा। ऐसे में उत्पादन बढ़ेगा और किसान को अधिक लाभकारी मूल्य मिल सकेगा। इसके लिए भले ही सरकार राशि की सीमा पांच हजार ही रखें पर इतनी राशि के बीज उर्वरक मिलेंगे तो इसका लाभ निश्चित रुप से उत्पादकता पर पड़ेगा। इसको यों समझना होगा कि नकद राशि भले ही किसान को सीधे खातें में हस्तांतरित हो पर उसका उपयोग खेती-किसानी में यानी कि खेती के काम के लिए ही होगा यह पक्का नहीं कहा जा सकता। ऐसे में यदि प्रमाणिकता, गुणवत्ता और क्षेत्र विशेष की जरुरत के अनुसार इतनी राशि के कृषि आदान किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं तो यह किसान और देश दोनों के लिए ही फायदें का सौदा होगा।

हमं इसको यों समझना चाहिए कि वर्षों से खाद पर अनुदान सीधे उत्पादक कंपनियों को दिया जा रहा है तो इसका लाभ किसान को सही मायने मंे नहीं मिल पा रहा। रुपया पैसा देंगे तो उसका उपयोग खेती किसानी मेें ही होगा यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता और तीसरी बात यह कि यदि खाद-बीज वितरण के रुप में इस राशि का उपयोग किया जाएगा तो यह शतप्रतिशत सही होगा कि उसका उपयोग खेत में ही होगा, सरकारी बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी तो उत्पादन बढ़ेगा और इससे देश में अन्नधन का भंडार भरेगा। किसान की आय बढ़ेगी और सही मायने में खेती किसानी का भला होगा। सरकारों को किसान की जरुरत की वस्तुएं अनुदान या निश्चित राशि तक की वस्तुएं उपलब्ध कराने  की पहल करनी चाहिए नाकि ऋण माफी या नकद राशि हस्तांतरण। केन्द्र व राज्य सरकारों को इस दिशा में गंभीर होना होगा। कोरोना महामारी ने आज कृषि पर ध्यान देने की और अधिक आवश्यकता महसूस करा दी है। ऐसे में नीति निर्माताओं को इस दिशा में चिंतन और मनन करना होगा।



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