अचानक हुई नोटबंदी के बाद जीएसटी ले रही है नागरिकों की सहनशक्ति की परीक्षा
| Rainbow News - Jul 1 2017 4:51PM

देश की प्रगति के नये मापदण्डों के तहत जीएसटी लागू कर दिया गया है। इस नये ढंग के शुल्क की पेंचेदगी में व्यापारियों से लेकर आम आवाम तक उलझकर रह गया है। पलक झपकते ही अनपढ ग्रामीण के साइवर मास्टर बन जाने वाली सरकारी कल्पना ने पहले मुद्राविहीन व्यवहार को मूर्त रूप दिया और जब गुलामी की मानसिकता में जकडी जनता ने मजबूरन इसे स्वीकार कर लिया तो अब जीएसटी के ऊंचे पैमाने को थोप दिया गया। अच्छाइयों और बुराइयों के प्रतिशत नकार भी दिया जाये तो भी इस दिशा में प्रशिक्षित करने, जागरूकता फैलाने और नागरिकों को विश्वास में लिए बिना तानाशाह की तरह लागू कर दिया गया। जीएसटी के विश्व आंकडों में काफी ऊंचाई पर आमद दर्ज करने वाली स्थितियां सुखद कदापि नहीं कही जा सकतीं।

विचार मंथन चल ही रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। प्रसिद्ध साहित्यकार सुरेन्द्र शर्मा ‘शिरीष’ जी का फोन था। उन्होंने मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। सो हमने तत्काल आने की सहमति दे दी। समाज का सत्य चित्रण करने वाले हस्ताक्षर के रूप में पहचान बना चुके ‘शिरीष’ जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कुछ समय बाद हम आमने सामने थे। जीएसटी पर मानसिक व्दन्द चल रहा था। सो हमने उनकी विचारधारा जाने की पहल की। साहित्यिक विधा से हटकर इस विषय पर प्रश्न करने का आधार पूछने लगे। साहित्य को समाज का दर्पण कहने वाली परिभाषा को रेखांकित करते हुए हमने कहा कि समाज के विभिन्न पक्षों से जुडी चेतना को शब्द चित्रों से उकेरने वाले से ज्यादा संवेदनशील और जागरूक कौन हो सकता है। धनात्मक और ऋणात्मक स्थितियों से परे होकर वास्तविक चित्रण करने वाला ही सटीक व्याख्या कर सकता है।

बाकी तो निहित स्वार्थों की विना पर स्थापित वाक्यों को ही आकार देंगे। तटस्थ विचारधारा ही सत्य के समीप होती है। हमारे तर्कों को उन्होंने स्वीकारोक्ति प्रदान की। एक बडे जनादेश से चुनी सरकार के निर्णयों विरुद्ध कमजोर विपक्ष की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लम्बे समय तक गुलामी की जंजीरों में जकडे रहने वाली मानसिकता से नयी पीढी अभी तक उबर नहीं पाई है। यही कारण है कि नोट बंदी का अचानक लिया गया कठोरतम निर्णय भी देशवासियों की सहनशक्ति ने विवाह टूटने, चिकित्सा के अभाव में होने वाली मौतें, पैसे के अभाव में समस्याओं से ग्रसित होने, बैंकों की लाइनों में खडे लोगों के काल के गाल में समा जाने के बाद भी उफ भी नहीं की। इस परीक्षा के बाद देश पर जीएसटी थोपा गया। किसी भी निर्णय के पहले न तो देश के आवाम को विश्वास में लिया गया और न ही नागरिकों को जागरूक किया गया।

तानाशाही की नई परिभाषा है जागरूकता के बिना थोपा गया निर्णय। विपक्ष को मात्र विपक्ष बनकर रह गया है। हमने उन्हे बीच में ही टोकते हुए कहा कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब उसने जीएसटी का खुलकर विरोध किया था और उसे लागू कर दिया। उनके चेहरे पर चमक उभर आई। देश हित से परे विपक्षी धर्म के निर्वहन की परम्परा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि श्रेय लेने की होड, वोट बैंक में इजाफे की मंशा और व्यक्तिगत हितों के पोषण पर देश की राजनीति केन्द्रित होकर रह गयी है। देश का भावनात्मक पक्ष आज भी शक्तिशाली है। व्यवसायिकता, यथार्थवाद और दूरदर्शिता जैसे आयाम गौड हो जाते हैं। संवेदनायें शिखरोन्मुख हो जाती है। ऐसे में दिमाग से सोचने वाले लोग दिल से सोचने वालों को अघोषित गुलाम बना लेते हैं। कहावत है कि प्यार और जंग में सब जायज होता है। बस यही स्थिति प्यार की सीमित और जंग की असीमित परिभाषा बन कर देश के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह अंकित करने लगी है।

तो आप जीएसटी को देश विरोधी करार देते हैं, हमने पुनः प्रश्न किया। बिलकुल नहीं। जीएसटी का पूरा खाका देश के सामने प्रदर्शित करना चाहिये था। वस्तु विशेष पर लगाये जाने वाले जीएसटी का कारण बताना चाहिये। उस सांख्यकीय विश्लेषण को भी स्पष्ट करना चाहिये जिसको आधार बनाकर प्रतिशत का निर्धारण किया गया है। सब कुछ स्पष्ट करके आम आवाम की राय मांगी जाना चाहिये ताकि उसकी धरातली मनोभूमि वातनुकूलित कमरों में चल रही बैठकों तक दस्तक दे सकें। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही देश की व्यवस्था को परिवर्तित करना चाहिये। बातचीत चल ही रही थी कि तभी उनके नौकर ने सोफे के मध्य रखी मेज पर नास्ते की प्लेटे सजाना शुरू कर दीं। व्यवधान उत्पन्न हुआ परन्तु तब तक हमें अपने विचारों को दिशा देने के लिए पर्याप्त धरातल मिल चुका था। सो नास्ता समाप्त करके पुनः मिलने का आश्वासन देकर उनसे विदा ली। फिलहाल इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

-रवीन्द्र अरजरिया



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