सियासी गांठ बिना सब सून
| -RN. Feature Desk - Oct 19 2020 12:50PM

-रामविलास जांगिड़

सियासी गांठे बहुत प्रकार से लगायी जाती है। सीबीआई, एसओजी, ईडी, आईटी आदि की सहायता से इन गांठों को और घुलाया जाता है। हर एक प्रकार की गांठ की अपनी विशेषता होती है। जिसे वक्त पड़ने पर खोलने में लगाने वाले के भी पसीने छूट जाते हैं। इन्हीं गांठों से विरोधी सियासत बाज को गहरा जकड़ा जाता है। बंधक बना लिया जाता है। कौनसी गांठ किस समय, किस प्रकार से लगाई जाती है; इसकी कुशलता एक चपल, चालबाज, चालू सियासत बाज को अच्छी तरह से आती है।

किसी चक्कर विशेष में डालने के लिये उपयुक्त गांठ का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। अगर राजनीतिक पार्टी में कहीं कोई छोटी सी भी गांठ हो, तो इसे अनदेखा न करें। अनदेखा करने पर राजनीतिक निर्वासन का कैंसर हो सकता है। देश की सभी पार्टियों की जांच करने में ऐसी गांठों से अस्सी फीसदी नेताओं में राजनीतिक निर्वासन के कैंसर की पुष्टि हुई है। पार्टी के भीतर कई नेता गांठबाज बने हुए बैठे हैं।

ऐसा आंख का अंधा व गांठ का पूरा नेता हल्दी की गांठ मिलने मात्र से पंसारी बनकर अपनी दुकान कचहरी के सामने खोल कर बैठ जाता है। यदि गांठ के आस-पास के चमचे व दलाल। होने लगे गरम और लाल। तो समझिए आपकी कुर्सी का होने वाला है बेहाल। तब लोभ लालच की हल्दी लगाते हुए करें इसकी देखभाल। साथ ही यह एक संक्रमण की ओर भी इशारा करता है। इससे आपके आसपास के नेता भी आपसे बिदक-कर अलग गुट बनाकर नई गांठ लगाने का काम करने लगेंगे। गांठों के बीच फिर नई गांठें पैदा करेंगे।

जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि, नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री सब बिकाऊ सामग्री बने हुए हैं। टिकाऊ का जमाना गायब है। बिकाऊ का जमाना चालू है। बिकने-बिकाने के मामले में कहीं कोई गांठें नहीं है। विधायक मंडी में उपलब्ध है। खरीदो और राज करो। अपने बिकने पर नाज करो। अपना माल बटोरो और जनता को मतदान के लिए धन्यवाद देकर चलते बनो। इधर की गांठ, उधर लगाते चलो। मतदाता लोकतंत्र के झांसे में खड़ा हुआ देखता रह जाता है। हर खरीदार का अपना एक संविधान चलेगा। हर खरीदार की अपनी गांठें है।

आज हर कहीं नेता अपने-अपने दल प्रमुखों के वक्तव्य गांठों की पोटली से ही निकलते हैं। इनका प्रत्युत्तर भी गांठों से ही मिलता है। सारी प्रेस कॉन्फ्रेंस गांठों से लबालब होती है। विपक्षी दलों के विरुद्ध कार्यवाही भी गांठों को खोलने-उलझाने का ही मार्ग है। राजा हो या रानी! दोनों की गांठें कहती एक कहानी।

इन गांठों के कारण सभी दल अपनी-अपनी गांठें लगाए, बैठे हैं अपना-अपना संविधान सजाए। मंत्री होने का एक अपना अलग ग्लैमर है। उनको तो सिवाय गांठें लगाने के कुछ समझ में ही नहीं आता है। इनके लिए शुद्ध स्वार्थ और महत्वाकांक्षा ही सब कुछ होता है। इन मंत्रियों की अपनी निजी गांठे होती है। जिसे वे अवसर व स्वार्थ की उंगलियों से खोलते-बांधते रहते हैं। सच है कि इस सियासी जीवन में गांठ बिना सब सून है। इन गांठों के कारण भले मानस के जीवन में न मोती है न चून है।



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