पलड़ा तो ट्रम्प का ही भारी लग रहा है
| -RN. Feature Desk - Oct 29 2020 1:00PM

-डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

अमेरिका में राष्ट्रपति के पद का चुनाव अभियान अंतिम दौर में पहुंच गया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीद्वार जो बाइडेन और वर्तमान राष्ट्रपति व रिपब्लिकन उम्मीद्वार डोनाल्ड ट्रम्प के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। हांलाकि गई बार की तरह हाॅकिंस एक बार फिर वोट कटवा उम्मीद्वार के रुप में मैदान में डटे हुए हैं। राजनीतिक बहसों और केम्पेन के दौरान एक दूसरे के खिलाफ जहर भी खूब उबला गया है तो एशियाई खासतौर से भारतीयों के वोट अपने पाले में करने के लिए हर संभव प्रयास भी किए गए हैं।

जहां एक और ट्रम्प मोदी के नाम का सहारा ले रहे हैं तो बाइडेन उपराष्ट्रपति पद पर भारतीय मूल की महिला को मैदान में उतार कर भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया है। इसमें कोई दो राय भी नहीं अमेरिका के कई राज्यों में भारतीय मूल के मतदाताओं का दबदबा है और यह भी सही है कि हार जीत को बदलने में यह महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकते हैं। यही कारण है कि डेमोक्रेटिक तो भारतीयों को अपने पक्ष में मान कर ही चलते हैं। हांलाकि मोदी का जलवा अमेरिका में भी कम नहीं है। अबकी बार मोदी सरकार की तर्ज पर वहां भी खूब नारे लगे हैं और लग रहे हैं।

एक बात साफ हो जानी चाहिए कि चाहे लाख सर्वे बाइडेन का पलड़ा भारी बता रहे हो या लोगों की ट्रम्प के बड़बोलेपन और खुरापातों से परेशान हो पर पिछले एक दशक का जिस तरह का माहौल दुनिया के देशों में राजनीति और राजनेताओं को लेकर बना है उससे विश्लेषक कुछ भी कहे पर आज भी पलड़ा तो भारी ट्रम्प का ही लग रहा है। दुनिया के लोग आज संजीदा नहीं बल्कि बोल्ड नेता को पसंद करने लगे हैं। निर्णय गलत हो या सही, परिणाम अच्छे निकले या खराब लोग निर्णय से नहीं निर्णय लेने की क्षमता  वाले नेता को पसंद करने लगे हैं।

हमारे देश और यहां भी खासतौर से मोदी जी को ही लें तो साफ हो जाता हैै कि लोग मोदी की निर्णय करने की स्टाइल को पसंद करती है। नोट वंदी, लाॅकडाउन, सीएए, 370 हटाना, तीन तलाक, कश्मीर को दो हिस्से कर केन्द्र शासित बनाने जैसे निर्णयों का भविष्य भविष्य के गर्व में होने के बावजूद लोग तत्काल निर्णय को अच्छा समझने लगे हैं। कमोबेस यही बात ट्रम्प में अमेरिकीयोें को लगने लगी है। ट्रम्प का बड़बोलापन ही उनकी विजय का प्रमुख कारण बनेगा।

हमारे यहां तो कहावत है कि बोलने वाले के तो भूंगड़े भी बिक जाते हैं और यही अब राजनीति में होने लगा है। पांच दशक पहले जंबूरे का खेल गली मौहल्लों के चैराहों पर आम था तो जंबूरे की आवाज पर भीड़ जुटने लगती थी वहीं स्थिति आज है। क्या सही है क्या गलत है यह मायने नहीं रखता बल्कि अब मायने यह रखने लगा है कि आप जो कह रहे हो या कर रहे हो उस पर टिके रहो। दुनिया के राजनीतिक हालात भी कुछ इसी तरह के होते जा रहे हैं। कोरोना से डरी सहमी दुनिया चीन से गले तक भर आई है तो इस्लामी आतंकवाद ने सारी दुनिया को हिला दिया है।

फ्रांस की हालिया घटना इसका बड़ा उदाहरण है। कोरोना को सारी दुनिया भुगत चुकी है और योरोप मंे तो कोरोना की दूसरी लहर आ गई है जिससे लोग ड़रे सहमें बैठे हैं। आज राजनीतिक चैसर इस तरह की बिछ चुकी हैं कि चीन दुनिया का दुश्मन नंबर एक हो गया है। ऐसे में चीन के खिलाफ दुनिया के देश एक हो रहे हैं तो ट्रम्प इसे भुनाने मंे कमी नहीं छोड़ रहे और अमेरिकीयों को ड्र्ेगन का डर दिखा रहे हैं। जहां तक भारतीय वोटों की बात है यह भी साफ हो जाना चाहिए कि चाहे बाइडेन और डेमोक्रेटिक पार्टी भारतीयों को अपने पक्ष में मानकर चल रही हो पर विश्लेषकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर सहित विभिन्न मामलों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने जिस तरह की प्रतिकियाएं जारी की थी और पाकिस्तान को शह देने का प्रयास किया था उसे भारतीय भूलेंगे नहीं।

आज राम मंदिर हो या कश्मीर से धारा 370 हटाना या चीन से टक्कर या फिर पाकिस्तान को कोर्नर कर देने में भारतीय कूटनीति सफल रही हैं उसके कारण लोग मोदी के कायल है। भले ही आर्थिक क्षेत्र में पिछडने या नोटबंदी की विफलता को लाख मुद्दा बनाया जाता हो। राफेल को लाने से देश गर्वान्वित है चाहे वह सस्ता आया या महंगा आम मतदाता को इससे कोई लेना देना नहीं है। लगभग यही स्थिति अमेरिका की है। ट्रम्प ने लोकल को लेकर जिस तरह का अभियान चलाया है और विदेशियों को वीजा को लेकर के जिस तरह से अंकुश लगाने का प्रयास किया है उससे अमेरिकी युवा खुश ही है। रंगभेद और अश्वेतों की खिलाफत के बावजूद ज्यादा उलटफेर के आसार कम ही लगते हैं।

ऐसे मेें साफ हो जाना चाहिए कि ट्रम्प चुनावी मैदान से किनारे नहीं होकर अंदरुनी तौर पर बढ़त बनाए हुए है। इसको यों भी समझा जा सकता है कि एक के बाद एक सर्वें में पिछड़ने के बाद ट्रम्प ने स्थिति को तेजी से सुधारा है। उनके पक्ष में माहौल बना है। लगता है कोरोना भी ट्रम्प की रणनीति का हिस्सा ही रहा हो पर यह साफ है कि ट्रम्प को हल्के में लेने की भूल नहीं की जानी चाहिए। हांलाकि 3 नवंबर को मतदान और उसके बाद परिणाम तो भविष्य के गर्व में छिपा है पर दुनिया के देश आज ढुलमुल नहीं बोल्ड नेता को पसंद कर रहे हैं ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका में दूसरी पारी खेलने आ जाए। इसका कारण भी है लोकलुभावन वादों के साथ ही आज का मतदाता को ग्लेमर चाहिए, चर्चा में रहने वाला व्यक्तित्व चाहिए और इसमें ट्रम्प निश्चित रुप से जो बाइडेन पर भारी पड़ते हैं।



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