KBC सवाल : इंदिरा गांधी ने क्यों रोका था राजे-महाराजाओ को मिलने वाला मोटा धन
| Agency - Oct 31 2020 1:17PM

कौन बनेगा करोड़पति यानि केबीसी के 12वें सीजन में जब अमिताभ बच्चन ने हॉट सीट पर बैठी प्रतियोगी से ये सवाल पूछा कि किस प्रधानमंत्री ने 1971 में राजाओं को मिलने वाला प्रिवीपर्स रोक लिया था, तो वो इस सवाल ने एकबारगी ने उन्हें परेशान कर दिया. क्या आपको मालूम है कि आजादी के बाद से 1971 तक राजाओं को भारत सरकार मोटा धन देती थी, जिस पर इंदिरा गांधी ने प्रधानमत्री बनने के बाद रोक लगा दी. हालांकि इस पर देश में गुस्से की तेज प्रतिक्रिया देखने को मिली थी.

1971 में इंदिरा गांधी ने दो बड़े फैसले लिए थे. जिसका बड़े पैमाने पर देश की आमजनता ने भारी स्वागत किया था लेकिन एक बड़ा और प्रभावशाली वर्ग इससे खफा भी हो गया. ये दो बड़े फैसले थे - प्राइवेट बैंकों का सरकारीकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स पर रोक. आजादी के बाद भारत लगातार गरीबी और कमजोर अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था. इसी के बीच सरकार की एक मोटी रकम उन राजाओं को प्रिवीपर्स देने में खर्च हो जाती थी, जिनकी रियासतों का विलय आजाद भारत में किया गया था.

राजाओं को मिलने वाले मोटे प्रिवी पर्स पर उठने लगे थे सवाल 

दरअसल भारत के आजाद होने के कुछ सालों बाद राजाओं के प्रिवीपर्स के खिलाफ जनता के बीच गुस्सा पैदा होने लगा. ये माना जाने लगा कि भारत प्रिवीपर्स के तौर पर जनता की भलाई पर खर्च होने वाले धन को बर्बाद कर रहा है. राजाओं के पास पहले से ही बेहिसाब धन-दौलत और संपत्ति, उस पर से उन्हें मोटा प्रिवीपर्स.

1969 में विधेयक गिर गया

इसे सरकार भी असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक मानने लगी. उसको खत्म करने का प्रस्ताव 1969 में लाया गया लेकिन राज्यसभा में ये विधेयक गिर गया. लोकसभा में इसे 332-154 वोटों से जीत मिली लेकिन राज्यसभा में 149-75 वोट अंतर से हार. जब इंदिरा गांधी नाकाम रहीं तो उन्होंने राष्ट्रपति वीवी गिरी ने सभी शासकों की मान्यता खत्म करने को कहा. इसे अदालत में चुनौती दी गई. ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को फिर झटका लगा.

1971 में इंदिरा ने प्रिवी पर्स रोकने का कानून बना ही दिया

इंदिरा गांधी की सरकार इस विधेयक को 1971 में दोबारा लेकर आई.1971 के चुनावों में इंदिरा गांधी की अगुवाई में कांग्रेस भारी मतों से जीती. अब उन्होंने संसद में इसे पास करवा कर ही दम लिया, उन्होंने इस बिल को लाने के पीछे सारे नागरिकों के लिये सामान अधिकार एवं सरकारी धन का व्यर्थ व्यय का हवाला दिया.

कई राजघराने कोर्ट में गए लेकिन नाकाम रहे

अबकी बार ये बिल 26वें संवैधानिक संशोधन के रूप में पारित हो गया. इसके साथ ही राजभत्ता और राजकीय उपाधियों का भारत में हमेशा के लिए अंत हो गया. हालांकि इस विधेयक के पारित होने के बाद कई पूर्व राजवंश अदालतों की शरण में गए लेकिन वहां उनकी सारी याचिकाएं खारिज हो गईं. इसी के विरोध में कई राजाओं ने 1971 के चुनाव में खड़े होने और नई पार्टी बनाने का फैसला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई.

क्या था प्रिवी पर्स का फार्मूला

भारत जब आजाद हो रहा था, तब यहां करीब 570 के आसपास प्रिसंले स्टेट थे. इन सभी को भारत में विलय के बाद एक खास तरीके से प्रिवीपर्स की रकम इनके राजाओं के लिए तय की गई. इसका फार्मूला था उन प्रिंसले स्टेट से सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व की करीब साढ़े आठ फीसदी रकम, जिसे आने वाले सालों में घटते जाना था. उत्तराधिकारियों को और कम रकम दी जाने वाली थी.

सबसे ज्यादा प्रिसी पर्स मैसूर के राजपरिवार को मिला, जो 26 लाख रुपए सालाना था. हैदराबाद के निजाम को 20 लाख रुपए मिले. वैसे प्रिवी पर्स की रेंज भी काफी दिलचस्प थी. काटोदिया के शासक को प्रिवी पर्स के रूप में महज 192 रुपए सालाना की रकम मिली. 555 शासकों में 398 के हिस्से 50 हजार रुपए सालाना से कम की रकम आई. 1947 में भारत के खाते से सात करोड़ रुपए प्रिसी पर्स के रूप में निकले. 1970 में ये रकम घटकर चार करोड़ रुपए सालाना रह गई.



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