झंडे डंडे का ठगबंधन
| -RN. Feature Desk - Dec 4 2020 4:43PM

-रामविलास जांगिड़

इस बार भानुमति को देखा तो दंग रह गया । टाइट जींस । आंखों पर चश्मा । गले में पार्टी पट्टा । हाथों में लैपटॉप । एकदम झकास! बड़ी सी गाड़ी में से उतरती । चारों और कैमरों की किलकारी शुरू हो गई । क्या मूवी कैमरा और क्या फोटोग्राफी कैमरा । किल्कियाते कैमरों के बीच भानुमति ने अपने दाएं हाथ को ऊंचा उठाया । उसे हवा में लहराया और दो उंगलियों को 'वी' आकार में फहराया । 

मौका देख कर मैं भानुमति के पास गया । सहानुभूति से पूछ बैठा - "क्यों जी भानुमति जी ! खूब छलांग लगाई । आखिर यह सब कैसे हुआ ?" भानुमति ने अपने आंखों के चश्मे को सिर पर चढ़ाया और कहा - "यू नो अबाउट जोड़-तोड़ ! यह सब जोड़-तोड़ का ही कमाल है ! बस इसी बल पर आज हम सरकार बनाने जा रहे हैं ।"  "लेकिन जोड़-तोड़ से सरकार कैसे बनती है ? मैं समझा नहीं । प्लीज जरा विस्तार से बताइए ना ।" मैंने पूछा तब भानुमति जी ने अपने हवा-हवाई वादों उर्फ बालों में उंगलियां घुमाते हुए कहा - "यह सब कमाल है तोड़-फोड़-मरोड़ का ! मेरा अनुभव यही रहा । मुझे हमेशा तोड़फोड़ करके मरोड़ने में मजा आता है । पहले मैं कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा प्रयोग में लाती । फिर इधर की बजरी उधर का सरिया लगाना मेरा मूलमंत्र रहा । 

इतिहास गवाह है मैंने कुनबा इसी तरह जोड़ा । यही मेरा सत्य और यही मेरा धर्म है ।"  "लेकिन राजनीति में कोई कुनबा थोड़ी जोड़ना होता है ?" मैं भानुमति जी से पूछ बैठा । भानुमति ने लगभग डांटते हुए कहा - "हे ढब्बू खटमल ! इतना भी नहीं जानते ! सूत्र को पकड़ो । सूत्र है कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा । कहीं की पार्टी कहीं का झमेला । कहीं का चंदा कहीं का मेला । कहीं का सांसद कहीं का भाषण । कहीं का झंडा कहीं का डंडा । सरकार बनाने का है यही इक फंडा । बस जुगाड़ करो ।

समान विचारधारा हो या विपरीत । विचारधारा गई भाड़ में । जो भी सरकार बने वो बस जुगाड़ में । चाहे चुनाव में कितनी विरोधी पार्टी ना रही हो । बस कहीं की पार्टी कहीं का सांसद । बना डालो अपना सरकारी कद । कहीं की पार्टी तोड़नी है । कहीं से सांसद पकड़ लाना है । कहीं का जुगाड़ लगाना है । विदेश यात्रा, रुपया, डॉलर, ठेका, पद, प्रतिष्ठा आदि के जाल बिछाकर भानुमति जोड़-तोड़ के लिए किसी रिसॉर्ट कुंज में विलीन हो गई । 



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