बिजली के झटकों से निजात के लिए करने होंगे सामूहिक प्रयास
| Rainbow News - Jul 9 2017 3:38PM

- रवीन्द्र अरजरिया/ मनुष्यों का अभिन्न अंग बन चुकी बिजली के बिना सुखद जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। कुछ समयके लिए बिजली का गुल हो जाना लोगों की आह-तौबा का कारण बन जाता है। ऐसे में विभागीय पेचेंदगी के नित नये स्वरूप सामने आ रहे है जिनके मकडजाल में जकडा आम आदमी इनका शिकार हो रहा है। विद्युत दफ्तरों में धरने प्रदर्शन से लेकर तोड-फोड तक की घटनाओं में निरंतर इजाफा हो रहा है। इन सब के पीछे के तथ्यों को जानने की उत्सुकता मन में उठी, तो याद आये हमारे नये-नये मित्र बने इसी विभाग के अधीक्षण अभियंता संजय निगम। तत्काल फोन लगाया तो उन्होंने उत्सुकता दिखाते हुआ हमें चाय पर आमंत्रित कर लिया। कुछ समय बाद हम आमने-सामने थे। की दीवार पर एक स्लोगन लगा हुआ था जिसमें लिखा था, यदि हम समाधान का हिस्सा नहीं है तो हम स्वयं एक समस्या हैं। आपसी कुशलक्षेम पूछने के बाद हमने कमरे लगे इसी स्लोगन से अपनी बात शुरू करना बेहतर समझा। समस्या नहीं होगी तो समाधान कैसे होगा, समस्या बताने वाला नहीं होगी तो बतायेगा कौन और यदि बताने वाले का पास ही समाधान होता तो वह आप तक आता क्यों, जैसे प्रश्नों की बौछार कर दी। उनके चेहरा पर हमारे प्रश्नों का सटीक समाधान न मिलने के भाव परिलक्षित होने लगा। उन्होंने अपने का सम्हालते हुए कहा कि आपकी बात शतप्रतिशत सही है परन्तु हमारा दर्शन कुछ हटकर है। हम समस्याओं से डरते नहीं बल्कि उनका डटकर सामने करते हैं। समस्या के साथ-साथ स्वविवेक से समाधान भी सुझाया जा सकता है यानि ऐसे व्यक्ति जो केवल समस्या का तत्काल समाधान चाहते हैं उनके लिए यह स्लोगन है। समाधान के लिए उसमें लगने वाले समय, उपलब्ध संसाधनों और व्यवस्था की सीमाओं को भी तो ध्यान में रखकर समाधान में सहयोगी बना जा सकता है। समस्या का अंग बनने के स्थान पर समाधान में भागीदारी दर्ज करें। हम उनके शब्दों की जुगाली में फंसने वाले नहीं। अगर ऐसा है तो फिर स्लोगन में संशोधन किया जाना चाहिये। इसे यूं कहा जा सकता है कि समस्या से दो-दो हाथ करने वालों को समाधान में भी सहयोग करना चाहिये ताकि वह स्थाई, सुरक्षित और सर्वमान्य हो सके। उन्होंने स्लोगन के वास्तविक अर्थ और उसमें संशोधन के हमारे प्रस्ताव को स्वीकारते हुए हमारी इस तात्कालिक निर्णायक क्षमता की जमकर तारीफ की। हम भी तारीफों के पुल पर चढकर अपनी यात्रा को उनकी इच्छित दिशा में मोडने को कदापि तैयार नहीं थे। उनकी विभागीय पेचेंदगी को रेखांकित करते हुए कहा कि बिजली की गुलाम हो चुकी मानवीय काया को अपने सुख के लिए कब तक शोषण का शिकार होना पडेगा। बढे हुए बिल, पावर कट की ऊपर जातीं स्थितियां, समस्याओं के समाधान के लिए भटकते लोगों की निरंतर बढती संख्या, एक विशेष वर्ग को लाइन लास के नाम पर दी जाने वाली सुविधायें, विभाग के ऊपर तानाशाही के आरोप जैसे आरोपों की अंतहीन श्रंखला है। वे प्रश्नो के अंबार से खासे चिंतित हो उठे। हम आपके प्रश्नों का क्रमवार उत्तर देने का प्रयास करते हैं। पहला प्रश्न बढे हुए बिलों से संबंधित है सो आकस्मिक निरीक्षण के दौरान उपभोक्ताओं द्वारा बरती गई अनेक उजागर हुई है। मीटर का बंद मिलना, मीटर से छेडछाड करना, कनेक्शन के बाद भी कटिया लगा कर बिजली चोरी करना, वर्तमान में उपयोग किये जा रहे उपकरणों के आधार पर लोड का निर्धारण न होना जैसी जैसी अनेक स्थितियां सामने आईं है जिनके आधार पर बिल की राशि में इजाफा होना स्वाभाविक है। पावर कट दो तरह से होता है। पहले में लाइन की मरम्मत, पूर्व घोषित सप्लाई की आपूर्ति बाधित होने जैसे कारक आते हैं। दूसरा कारण है अचानक ओवर लोडिंग हो जाना, प्रकृतिक आपदा से लाइन में क्षति हो जाना, ट्रांसफार्मर की यांत्रिक खराबी जैसे कारक हैं। पहले कारण में हम आम उपभोक्ताओं को समाचार-पत्रों, माइक से एनाउंसमेंट जैसे माध्यमों से अवगत करा देते हैं। दूसरा कारण आकस्मिक होता है जिसकी पूर्व घोषणा नहीं की जा सकती। समाधान का अति लम्बा होता देख हमने उन्हें बीच में ही टोक दिया। विभाग की अंतहीन समस्याओं का अंतहीन समाधान विश्लेषण से बाहर आने की बात कहते हुए हमने उनसे कहा किय यदि संक्षेप में उत्तरों को प्रस्तुत करें, तो निश्चय ही गागर में सागर भरने की कहावत चरितार्थ हो जायेगी। अपनी विस्तारवादी नीति पर उन्होंने खेद प्रगट करने हुए उन्होंने विशेष वर्ग को दी जाने वाली सुविधाओं को स्पष्ट करने का निवेदन किया। हमने कहा कि सरकारी अफसरों, राजनीति से जुडे लोग, दबंग औद्योगिक घराने, बडे व्यवसायी सहित अल्पसंख्यकों की संगठित गुंडागिरी के आगे विभागीय कार्यवाही दम तोड देती है। उन के लालाट पर पसीने की बूंदे स्पष्ट देखी जा सकतीं थी। भीड की दवाव झेल रहे देश के व्यवस्था तंत्र से हम भी अलग नहीं है। राष्ट्रीय परिपेक्ष से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मंच तक लोगों की संकुचित हो चुकी मानसिकता के उदाहरण देखे जा सकते हैं। हम अपने संसाधनों की उपलब्धता, विभागीय निर्देशों की सीमायें और जानमाल की सुरक्षा की स्थितियों का विश्लेषण करते हुए हम नियमों के अनुपालन को कडाई से लागू करने के लिए संकल्पित है। तभी उनके नौकर कमरे में प्रवेश किया और मेज पर सजाने लगा चाय और स्वल्पाहार की प्लेटें। हमें लगा कि बिजली के इन झटकों से निजात पाने के लिए सामूहिक प्रयास ही करना पडेगा तभी सार्थक परिणाम सामने आ सकेंगे। उनके स्तर पर दिये जाने वाले तकनीकी समाधानों को स्वीकार करते हुए फिर कभी इस विषय पर चर्चा के लिए बैठने का वायदा किया। उन्होंने एक लम्बी सांस लेते हुए राहत महसूस की। हमने कप और प्लेटों का सम्मान किया और विदा मांगी। फिलहाल इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। खुदा हाफिज।

 



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