बजट गणित का चक्रवृद्धि ब्याज
| -RN. Feature Desk - Feb 2 2021 12:30PM

-रामविलास जांगिड़

जब से गणित पल्ले पड़ी तब से जीवन में बोझ स्वरूप सिर्फ चक्रवर्ती ब्याज ही बन पड़ा हूं। मैं और मेरा दोस्त सुबह उठते और जंगल जाने से पूर्व चक्रवर्ती ब्याज के प्रश्न हल करने बैठ जाया करते। हम ब्याज से उलझते और ब्याज हमसे चक्रवर्ती बनकर उलझता ही रहता। जब चक्रवर्ती ब्याज हमारे दिमाग में चक्र रूप धर अंदर प्रेशर डालता तो हम जंगल की ओर लोटा लेकर भागते। आते ही सवाल बनता कि अगर रमेश ने मेरे पिताश्री को 50 रुपये उधार दिए, तब 2 रुपये सैंकड़े से 3 साल में मेरे पिताश्री रमेश को कितना चक्रवर्ती ब्याज चुका पाएंगे? मैं इसका उत्तर हमेशा जीरो ही बताता; क्योंकि मेरे पिताजी जिसका रुपया एक बार लेते हैं उसे वापस नहीं देते हैं। देंगे भी कहां से? रुपया हो तो दें!

अब इत्ती सी गणित हर किसी के समझ में नहीं आती। अगर 2 बीघा खेत को 3 किसान 1 दिन में जोत देते हैं, तो उसी खेत को 5 किसान कितने दिन में जोत देंगे? इस सवाल ने हमें बहुत उलझाया। कमबख्त जो खेत पहले से ही जोत दिया गया है, उसे बार-बार जोतने में कौनसी गणिताई है! सब बकवास बाजी करनी पड़ती। जूते हुए खेत को 50 बार जोतना पड़ता। अब भी यही हालात है। इस गड्ढे की मिट्टी खोदकर उस गड्ढे में डालना और उस गड्ढे की मिट्टी को इस गड्ढे में डालना। सड़क बनाने के लिए पाइप काटना और पाइप लगाने के लिए सड़क काटना।

जीवन बजट में चक्रवृद्धि ब्याज दोपहर से लेकर शाम होने और रात की अंतिम सांस लेने तक पीछा नहीं छोड़ते। गणित के मास्टर जी कहते- रमेश किसी टंकी में पानी भरने में 3 घंटे लेता है और उसी समय दिनेश और महेश उस पानी को खाली करने में 2 घंटे ले लेते हैं। जब तीनों बदमाश एक साथ यह नलोन्मुखी दार्शनिक काम करते हैं, तो बताओ टंकी कब भरेगी? कमबख्त खाली करने वाले दोनों बदमाशों को रोका नहीं जा सकता था क्या? उनके चार झापड़ मार-कर पानी की बर्बादी बंद नहीं की जा सकती थी क्या? लेकिन नहीं हुजूर! सारी दुश्मनी तो मेरे और चंद्रप्रकाश से ही निभाई जाती। दो जने खाली करने वाले और बेचारा अकेला भरने वाला! वे खाली करते रहेंगे और हम मरते-खपते हिसाब लगाते रहेंगे।

टंकी खाली करने वाला एक जीव अब नेता बन गया है और वह अब भी राष्ट्रीय योजनाओं में लगाए गए धन को खाली कर रहा है। दूसरा एक बड़ा अफसर बनकर अब भी यही काम कर रहा है। कितना ही हिसाब लगा लें, कमबख्त अब भी पकड़ में नहीं आते। और तो और हमसे यह भी हिसाब मांगा जाता कि 17 ऊंटों को दो भाइयों में बराबर-बराबर बांट कर दिखाओ और ऊंट कटना भी नहीं चाहिए। ऊंट को काटना भी नहीं है और बांटना भी बराबर-बराबर! भारत-पाकिस्तान से लेकर चाइना-ताइवान तक ऊंटों को बराबर बांटने का सवाल अभी तक बना हुआ है। जीवन में आज भी चक्रवृद्धि ब्याज ने जाने कौनसे इच्छाधारी बजट का रूप धरकर फन फैला रखा है।



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