अथ जालीदास फैंकबुक कथाया:
| -RN. Feature Desk - Mar 2 2021 1:18PM

-रामविलास जांगिड़

कवि जालीदास ने अपना जाल फेकबुक उर्फ फैंकबुक पर फेंका और उसमें कई दोहे फंस कर आ गए। तत्पश्चात टि्वटराने से ये समस्त चराचर में छा गए। फटाक से कवि जालीदास सबके मन भा गए। उन्होंने अपने नितांत निजी हाथों में मोबाइल लिया और साफ-सट्ट कहा।

'फेकबुक इक दर्द है, सबसे बड़ी चिरांध।
छोडूं मन फड़-फड़ करे, रखूं कलेजे बांध।1।'

फेकबुक को एक पल भी छोड़ा नहीं जा सकता है। यह एक मीठा दर्द है। सबसे बड़ी परेशानी और चिरांध भी है। फिर भी इसे कलेजे पर बांधे रखने का ही धार्मिक महत्व है। इसे कलेजे से बांधकर ना रखने पर कलेजा धक-धक करना बंद कर देता है। कवि ने फेकबुक के दर्द का विरोधाभास उजागर किया है।

'रग रग रम-सा रम गया, बतरस बहती धार।
उल्लू जैसे लटक रहे, रस-वंती नर नार।2।'

यह फेकबुक रम की बोतल सा रोम-रोम में बस गया है। इसमें आलतू फालतू जालतू बातों की रसीली महकीली धारा बहती है। इसी रस-धार में भ्रूण, किशोर, वृद्ध, नर, नारी, मुर्दा, भूत, प्रेत, चुड़ैल, डाकिन आदि रात-रात जागकर उल्लू जैसे लटकते भटकते बहकते हुए मटक रहे हैं। कवि ने श्लेष, रूपक, उपमा, व्यतिरेक आदि अलंकारों का भरपूर प्रयोग कर अपना कवि परिचय दिया है।

'हाथ कोई खाली नहीं, उंगली करे टचियात।
पास कामणी अनमनी, चहुं दिशी खनके रात।3।'

कवि कहता है कि इस समय कोई हाथ खाली नहीं है। पाणि संस्कार में मोबाइल ग्रसित है। अंगूठा लाइक्स में धंसित है। हर उंगली मोबाइल पर टच-टचा रही है। रंगशाला में हीर अनमनी बेसुध होकर बैठी है। लेकिन रांझे की रात हर दिशा में कहीं ओर ही खनक रही है। कवि ने आधुनिक हीर-रांझे की फेकबुक व्यथा प्रकट की है।

'इन बॉक्स में आ गया, मीठा एक चकोर।
सेटिंग डेटिंग चैटिंग में, जाने कब हुई भोर।4।'

मैसेंजर इनबॉक्स में चांदनी सा धवल चंचल चितबल सर्वथा नवल एक मीठा बतौलबाज चकोर आकर बैठ गया है। चैटस्य, चैटिंगो, चैटाणां मंत्र जाप से जाने कब सारी रात बीत गई है। मोबाइल की सारी बैटरी रीत गई है। इसका कुछ पता नहीं पड़ा है। समय पंख लगाकर जाने कहां उड़ा है। कवि ने अंग्रेजी भाषा का अच्छा प्रयोग करके अपने पढ़े-लिखे होने का आभास कराया है।

'झूठ सच के लिबास में, पल-पल सेल्फी लेय।
कौए सब बुगले भए, अति मीठे मंतर देय।5।'

संसार का सारा झूठ सच के कपड़े पहनकर बार-बार सेल्फी ले रहा है। कुल मिलाकर झूठ सेल्फिया रहा है। कवि जालीदास कहते हैं कि सारे कौओं ने बगुला रूप धरकर मीठे-मीठे मंत्र देना शुरू कर दिया है। इस मीठे मंतर में सारा जीवन मर चुका है। कवि झूठ सच को कौआ बुगला कहकर अपना असली मंतव्य प्रकट कर रहा है।

'आम्र मंजरी फोन में, क्लिक-क्लिक किलकाय।
बसंत बेचारा एकला, कोयल कहीं ट्विटराय।6।'

ऋतुराज बसंत के इस रमणीक मौके पर सारे आम और उनकी मंजरियां फोन में सिमट कर रह गई है। हर एक जीव क्लिक क्लिक करते हुए डिजिटल मंजरी पर मंडरा रहा है। बाहर बेचारा बसंत अकेला बैठा है। मंजरी फोन में झूल रही है। कोयल कहीं तीसरी दिशा में ट्वीट-ट्वीट ट्वीटरा रही है। कवि ने वसंत की बदरंग अवस्था का सांगोपांग रूपक प्रकट किया है। नेति-नेति जालीदास फैंकबुक कथाया:।



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