दिनचर्या के अनुशासनहीन होने से मिलती है बीमारियों की सौगात
| Rainbow News - Jul 16 2017 11:16AM

-रवीन्द्र अरजरिया/ स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है, इस कहावत के साथ जीवन का लक्ष्य सहित सत्य जुडा है। कार्य क्षमता के निर्धारण में शारीरिक शक्ति की महती भूमिका होती है परन्तु वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के मकड जाल में जकडी मानवीय काया भौतिक उपलब्धियों की प्रतियोगिता की अंधी दौड में शामिल हो चुकी है। ऐसे में शारीरिक व्याधियों की बहुआयामी प्रजातियां पैदा होने लगी हैं। चिकित्सालयों में मरीजों की लम्बी-लम्बी कतारें, डाक्टरों का भारी-भारी सलाह शुल्क और दवाइयों की कमर तोड महंगाई ने आम आदमी को हिला कर रख दिया है। विचार चल ही रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। हमारे पुराने मित्र अब्दुल हकीम का फोन था। हकीम साहब केवल नाम के ही नहीं बल्कि काम के भी मशहूर हुनरदार हैं। होम्योपैथी के जाने माने चिकित्सकों में उनका नाम शामिल है। उनकी मुलाकात की ख्वाइश ने हमारे जेहन में चल रही तस्वीर को आखिरी मुकाम तक पहुंचाने का रास्ता दिखा दिया।

सो तत्काल तैयार हुआ और उनके दौलतखाने पर हाजिरी देने की गरज से निकल पडा। कुछ वक्त बाद हम आमने सामने थे। मिजाजपोशी के बाद ताजा हालात पर चर्चाओं का दौर चल निकला या यूं कहिये हमने खुद ही आपसी गुख्तगू को एक नया मोड दे दिया। बीमारियों की सुनामी का जिक्र करते ही उन्होंने खुद ही वो लाइन पकड ली। लोगों की जिन्दगी में खुद से ज्यादा दौलत कमाने की पैदा हो रही हवस का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पहले इंसान ने खुद को गुम किया, फिर खुदा को गुम किया और अब जिस्म को गुम करने के पीछे पडा है। दिन भर की भाग-दौड में बेतहाशा इजाफा, खान-पान के मुकम्मल इंतजाम में कमी, दौलत की दिन-ओ-दिन बढती हवस, खुदगर्जी का बोलवाला, ईमान की रुखसती जैसे इंशानी उसूलों की तब्दील होती हवा ने मुसीबतों का पहाड खडा करना शुरू कर दिया है। पकवान है पर खाने को सूखी रोटी की सिफारिश, एसी है पर खुली हवा में रहने की डाक्टरी सलाह, ढेरों महंगे सूट हैं पर सूती पहने की मजबूरी, मोटे-मोटे गद्दे हैं पर निखालिश दरी पर बिना तकिया के सोने की मजबूरी जैसे फलसफे रोज देखे जा रहे हैं। इन सब के पीछे है रोजमर्रा की बेतरतीब जिन्दगी के मायने। कुछ भी खाना, कुछ भी पहना और कुछ भी करना परन्तु पैसा कमाना। इस उसूल ने लोगों को जानी-अनजानी बीमारियों की सौगात मुफ्त में दे रखी है। हमें लगा कि फौरी तौर पर हो रही गुख्तगू को तनिक गहराई में उतारा जाये। सो सवाल दाग दिया।

दिमागी कमजोरी को दर किनार कर भी दें तो जिस्मानी बीमारियों के मुकम्मल इलाज के लिए आपकी होम्योपैथी में ऐसी क्या है जो अन्य में नहीं है। ऐलोपैथी में दी जाने वाली दवाओं से प्रतिकूल प्रभाव होने की संभावनायें कहीं न कहीं होतीं ही है परन्तु हमारी पैथी में ऐसी संभावनाओं का प्रतिशत 5 होता है। आकस्मिक चिकित्सा की स्थिति को रेखांकित करते हुए हमने कहा कि आपकी पैथी में तत्काल प्रभावी होने वाली दवाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा है। मानो उनके अहम पर चोट की गई हो, उन्होंने कहा कि यह भ्रामक प्रचार अन्य पैथियों से जुडे न समझ लोगों द्वारा किया गया है जिसका कोई आधार उनके पास नहीं है। जब मृत्यु सिर पर दस्तक देती है तब भी होम्योपैथी संजीवनी बनकर लोगों को नया जीवन प्रदान करने में सक्षम है। हमने बीच में ही प्रश्न दाग दिया। ऐसा कैसे हो सकता है। उन्होंने भी नहले पर दहला दिया और कहा कि हो सकता नहीं बल्कि होता है। हमारा सिद्धान्त है कि जो तत्व जैसे लक्षण पैदा करने में सक्षम है वही तत्व वैसे ही तत्वों का शमन करने करने में भी सक्षम हैं। यही वह सूत्र वाक्य है जिस पर हम तत्व के घटते क्रम में ज्यादा प्रभावी दवा बनाते हैं और ऐलोपैथी तत्वों के बढते क्रम में औषधियों का निर्माण निर्माण करता है। दवाओं की निर्माण प्रक्रिया की तकनीय जानने में हमारी कदापि रुचि नहीं थी। सो बीच में भी नई दिशा देने की गरज से सवाल कर दिया कि किन आधारों पर होम्योपैथी बीमारी के स्वरूप का निर्धारण करती है।

शारीरिक बनावट, हावों के संकेत, बात करने का ढंग, मानसिक स्थितियां आदि सभी का गहन अध्ययन करने के बाद ही दवाओं का निर्धारण करने के मूल को समझाते हुए उन्होंने कि किसी एक लक्षण पर निर्धारित की गई दवा की सफलता संभावित ही होती है। दवा का निर्धारण ही नहीं उसकी शक्ति का निर्धारण भी एक महात्वपूर्ण कारक है, जिसके बिना सफलता के प्रतिशत में इजाफा नही हो सकता। वर्तमान युग की विभीषिकाओं की ओर उनका ध्यानाकर्षित करते हुए हमने कहा कि वर्तमान स्वास्थ का प्रतिशत काफी नीचे आ गया है। प्रत्येक घर में एक से अधिक बीमार सदस्य मौजूद है और बीमारिया भी नित नये रूप में सामने आ रहीं हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं। दिनचर्या का अनुशानहीन होना। प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है। पौष्टिक आहार से लेकर स्वस्छ पर्यावरण तक के खजाने बिखरे पडे है। अति संकलन करने की हमारी प्रवृति ने ही विनाश के दावानल को आमंत्रित किया है। मानसिक प्रदूषण ने ही बीमारियों की विसात बिछाई है। दौलत की हवस ने मानवीय काय को मशीन बना दिया है ऐसे में सुख की कल्पना करना, मृगमारीचिका के पीछे भागकर लक्ष्य प्राप्त करने की कल्पना जैसा है। बातचीत चल ही रही थी कि तभी उनके नौकर ने कमरे में आकर शीतल पेय और स्वल्पाहर सामने रखी मेज पर सजाने का उपक्रम किया। व्यवधान उत्पन्न हुआ परन्तु तब तक हमें हमारे प्रश्नों का काफी हद तक समाधान मिल चुका था। सो बातचीत को पूर्ण विराम लगाकर मेज का सम्मान करने का उनके फरमान की तामीली की गई। फिलहाल इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। खुदा हाफिज।



Browse By Tags



Other News