ग्राउंड जीरो पर कुर्सी बाजी!
| -RN. Feature Desk - Apr 2 2021 12:15PM

-रामविलास जांगिड़

वोटर ग्राउंड जीरो पर चुपचाप पड़ा है। वह खाट पर लेटा है। उसकी पीठ और पेट आपस में मिलकर खाट में समा गए हैं। तभी कहीं से अचानक आवाज आई। वोटर देखता है कि दो रथ-कार सवार भागते हुए चले आ रहे हैैं। एक उत्तर तो, दूसरा दक्षिण दिशा से। दोनों एक दूसरे पर आक्रोशित हैं। अपने-अपने पार्टी आलाकमान के शब्दों की बौछार कर रहे हैं। अपनी-अपनी गोत्र, अपनी-अपनी गाली और अपनी-अपनी गुंडई का भरपूर प्रदर्शन कर रहे हैं।

दिव्य गाली वादन का अनहद नाद चल रहा है। उन्होंने अपनी-अपनी पार्टी पताका को हवा में लहरा दिया है। खाट पर लेटा है वोटर! वोटर देखता है उस गांव की छोटी सी पगडंडी की ओर। जहां दोनों तरफ के पेड़ों पर नाना भांति की पार्टी पताकाएं फहराई हुई है। झोंपड़ियों की दीवारों पर अपने-अपने ढंग के नारे गुदे हुए हैं। कारों की रथयात्रा से उसकी आंख खुल गई है। सामने सूरज डूबने की तैयारी में है। उसकी सुनहरी किरणें पेड़, पत्ते, पगडंडी आदि जिसे भी छू रही है, वह स्वर्णिम लग रहा है। ये है जीवन का संध्या काल! छोड़ रहा है द्वंद्व भरे सवाल!

अचानक वोटर की निगाह एक कुर्सी पर पड़ी। उसने देखा कि दोनों कार सवार पार्टी-बाज कुर्सी पर नजरें जमाए हुए हैं। बहुमूल्य कुर्सी! चुनाव काल की सबसे मनोरम कुर्सी! यह कुर्सी सीधा मंत्री बनाती है। यह धूल-धुसरित पगडंडी में भी बहुत चमक रही है। हजारों हीरों की चमक सी! दोनों पार्टी-बाज इसी कुर्सी के लिए एक दूसरे से बुरी तरह से झगड़ रहे हैं। अपनी-अपनी मिथ्या बातों पर अकड़ रहे हैं। जैसे ही वोटर ने अपनी वासना को देखा, वह तत्क्षण कुर्सी निहारने लगा।

क्षण में वोटर का मन भूल गया सारे अनुभव विशाद! एक क्षण वोटर को लगा, क्यों नहीं वह भी इस कुर्सी पर स्वयं बैठ जाए! तभी उसने आप से कहा- रे मूर्ख, पागल! तेरी क्या औकात है? क्या तुझे ऐसी झूठी, फरेबी, पाखंडी जीवन जीने की आदत है? विचारों का बवंडर उठ गया। तभी दोनों पार्टी-बाज रथ-कार सवार उस कुर्सी के दोनों ओर खड़े हो गए। उन्होंने अपनी-अपनी गालियों, गुंडागर्दियों व जात-गोत्र की बंदूकें-तोपें निकाल ली। एक दूसरे को ललकारना शुरू किया। 

दोनों ने कहा- मेरी नजर सबसे पहले इस कुर्सी पर पड़ी; इसलिए इस कुर्सी का हकदार मैं हूं। उनकी बातों से यह सब निर्णय असंभव था। बातों-लातों की तोपें-तलवारें खिंच गई। क्षण भर में दो लाशें पड़ी थी। तड़पती लहूलुहान! कुर्सी अपनी जगह पड़ी थी। इधर वोटर खाट पर लेटा सब देखता रहा। सूरज की किरणें अब कुछ कोमल हो गई थी। संध्या रानी अपनी कालिमा बिखेरने की तैयारी में लग गई थी।

कुर्सी बेचारी यह जान भी नहीं पाई कि क्षण-क्षण इसके आसपास यह सब क्या घटित हो रहा है? यह सब क्या-कैसे हो रहा है? सिर्फ मुझ निर्जीव के लिए! कुर्सी बेचारी अपने चिंतन में झूलने लगी! दो आदमी अभी-अभी जीवित थे। उनकी धमनियों में खून प्रवाहित हो रहा था। सांसें चल रही थी। दिल धड़क रहा था। मन कुछ सपने बुन रहा था। पर एक क्षण में ही दोनों ने अपने प्राण गंवा दिए। सिर्फ एक लकड़ी की कुर्सी के लिए! वोटर ने अपनी आंखें मूंद ली। जीवन का सबसे गहरा सत्य कुर्सी है; कहकर सूरज ने अंतिम सांस ली।



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