देश में मृत्यु का तीसरा बडा कारण बनते लकवा को धता बताने में लगा एक आन्दोलन
| Rainbow News - Jul 24 2017 2:00PM

सरकार को लेना पडेगा समान स्वास्थ सुविधायें देने का संकल्प

‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है’, यह आदर्श वाक्य जीवन में सफलता की कुंजी के रूप में निरंतर सम्मानित होता रहा है। शरीर को विकार रहित बनाने के लिए अनुशासित दिनचर्या, संतुलित आहार और सात्विक विचारों की महती आवश्यकता होती है। किसी भी एक कारक के प्रभावित होने से जीवन में कष्टों का प्रादुर्भाव हो जाता है। वर्तमान समाज में चिकित्सालयों की बढती संख्या, मरीजों की भीड और लगभग प्रत्येक परिवार में रोगियों की उपस्थिति के आंकडों ने विश्वभाल पर चिन्ता की लकीरें गहरी कर दी हैं। आखिर बीमारियों के निरंतर बढ रहे प्रकोप के पीछे पनप रहे कारणों को जानने की जिग्यासा बलवती हो उठी। ज्यों-ज्यों सोच का दायरा बढता गया त्यों-त्यों चिकित्सा जगत के किसी अनुभव हस्ताक्षर की मानसिक खोज तेज होती गई। अचानक न्यूरोलाजी के प्रसिद्ध चिकित्सक डाक्टर केतन चतुर्वेदी का चेहरा, उनकी प्रसिद्धि और उन्हें सम्मानित करने वाले अनेक समारोह सजीव हो उठे। वे हमारे अच्छे मित्रों में से एक हैं।

सो उन्हें फोन लगा दिया। उत्साहपूर्वक उत्सुकता भरा स्वर दूसरी ओर से उभरा। बहुत दिनों बाद याद करने का उलहना देते हुए उन्होंने हमारी कुशलक्षेम पूछी। यह जानकर कि हम नागपुर में ही है तो तत्काल मिलने की बेचैनी व्यक्त करने लगे। हमने भी उनके आवास इन्द्राणी इन्क्लेव की ओर रुख किया। कुछ समय के बाद हम आमने-सामने थे। अपनत्व के सामने औपचारिकतायें गौढ हो गई। कुछ समय तक बीती स्मृतियों के सुखद स्पन्दन को ताजा करने के बाद हमने अपने मन में चल रही ऊहापोह से उन्हें अवगत कराया। हमेशा मुस्कुराते रहने वाले चिकित्सक के चेहरे पर गम्भीरता अधिकार कर लिया। देश में मृत्यु के कारणों में से तीसरे प्रमुख कारण के रूप में लकवा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह बीमारी जिस तरह से देश में अपने पैर फैला रही है, उसे सुखद कदापि नहीं कहा जा सकता है। हमने तो इस रोग के प्रति लोगों को जागरूक करने का अभियान छेड रखा है। छोटे बच्चों से लेकर उम्रदराज लोगों तक इस रोग ने कब्जा करना शुरू कर दिया है।

सहज संवाद

शरीर में सुन्नपन, टेढापन, असंतुलन, कमजोरी, बेहोशी, तेज बुखार जैसे अनेक लक्षणों के साथ दस्तक देने वाला यह रोग बहुत तेजी से फैलकर शरीर के एक बडे भाग पर कब्जा कर लेता है। हमने उन्हें बीच में ही टोकते हुए कहा कि शायद यही सोचकर आपने एम.डी. करने के बाद न्यूरोलाजी में डी.एम. किया और इसी दिशा में शोध में जुट गये। उन्होंने स्वीकारोक्ति देते हुए छत को घूरना शुरू कर दिया। उन्हें सन् 2001 के एमबीबीएस काल से लेकर 2006 का एमडी काल होते हुए 2009 का डीएम काल याद आने लगा जब वे अध्ययनरत थे। उसी दौरान अनेक शोध-पत्रों पर भी काम करना शुरू कर दिया था। तब एक अच्छे न्यूरोलाजिस्ट् की खासी कमी थी। नसों के जाल से लेकर विभिन्न अंगों के संतुलित क्रियाकलापों को नियंत्रित करने वाला यह कारक वास्तव में व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वस्थ को सीधा प्रभावित भी करता है और संतुलन की स्थिति में स्वास्थ लाभ भी देता है। संवेदना शून्य चेहरे के साथ अंतरिक्ष में कहीं मौन संवाद करता देखकर हमने उन्हें झकझोरते हुये कहा कि कहां खो गये मित्र।

वे चौंक कर वर्तमान में लौट आये। सारी शब्द का उच्चारण करने हुए उन्होंने कहा कि न्यूरोलाजिस्ट को विभिन्न जटिलताओं से जूझते हुए व्याधियों को दूर करने का सटीक रास्ता खोजना पडता है। इस उपचार में पूरा शरीर प्रभावित होता है। रोग की जड तक पहुंचे बिना सटीक निदान सम्भव नहीं होता। हमने उनसे पूछा कि बच्चों में लकवा होने की पहचान कैसे की जा सकती है। आंशिक मिर्गी, कुपोषण, नींद की कमी, जिद करना, बहाने बनाना जैसे लक्षण उभर कर सामने आते हैं, जिन्हें अक्सर लोग नजरंदाज कर देते हैं। वर्तमान समय में फास्ट फूड, निद्रा में कमी, कार्य की अधिकता, तनाव, अनियमित खान-पान, भौतिक सुख की मृगमारीचिका जैसे अनेक कारण हैं जिनसे लकवा होने का खतरा पैदा हो जाता है। निदान के बारे में पूछने पर उन्होंने ‘आओ प्रकृति की ओर लौट चलें’, का मंत्र देते हुए अनुशासित जीवन, योग-व्यायाम की योगदान और सत् चिन्तन जैसे निदान सुझाये।

उन्होंने कहा कि हमारे जैसे लोग चिडिया बनकर अपनी चौंच में जागरूकता और निदान का पानी भर कर लकवा की विशाल आग को बुझाने का प्रयास तो करते ही रहेंगे अगर देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसी स्वास्थ सुविधायें देने के लिए सरकार संकल्पित हो जाये तो सार्थक परिणामों की अवतरण होते देर नहीं लगेगी। अभी बात चल ही रही थी कि उनके नौकर ने समाने रखी मेज पर स्वल्पाहार सजाना शुरू कर दिया। हमें भी तब तक अपने मन में चल रहे व्दन्द से काफी हद तक मुक्ति मिल गई थी। सो स्वल्पाहार का सम्मान करने लिए तैयार होने लगे। स्वल्पाहार के बाद उन्होंने हमें लंच किये बिना जाने नहीं दिया। बाद में एयरपोर्ट तक स्वयं भेजने आये। इस सप्ताह बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

-रवीन्द्र अरजरिया



Browse By Tags



Other News