आत्मबल में निरंतर बढोत्तरी करती है रक्षा-सूत्र की संस्कारित ऊर्जा
| Rainbow News - Aug 6 2017 6:32PM

-रवीन्द्र अरजरिया/ संरक्षण के बिना जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। इसके लिए विभिन्न संबंधों की दुहाई के साथ-साथ अनेकानेक उपायों को मूर्त रूप देने के प्रयास किया जाते हैं। वैदिक रीतियों में देव शक्तियों के कवच, सनातन व्यवस्था के तहत पारिवारिक संबंधों से लेकर भावनात्मक रिश्तों तक और संविधान की स्थापना के बाद से राष्ट्रीय सुरक्षा के मूल्य व्यवहार में आये। कवच से जुडे परा-विज्ञान के शोधों पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है जबकि वर्ण से लेकर जाति तक पहुंची सनातन व्यवस्था ने गुरू-शिष्य, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-बहिन जैसे अनगिनत रिश्तों को मूर्त रूप देकर भावनात्मक संवेदनाओं की स्थापना की। विश्व परिदृश्य में विशेष भू-भागों के आधार पर देशों का परिकल्पना ने साकार रूप देकर नागरिकों के लिए संवैधानिक बाध्यता को कडाई से लागू किया।

संरक्षण के आइने से आत्मविश्वास की वृद्धि को नापने के लिए हमारा मस्तिष्क इस दिशा के किसी जानकार की तलाश करने लगा, तभी फोन की घंटी ने चिन्तन के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करना शुरू कर दिया। फोन पर दूसरी ओर से भक्ति योग आश्रम ट्रस्ट के परमाध्यक्ष स्वामी शंकरानन्द जी सरस्वती की स्वर गूंजा। उन्होंने हमें अवसर दिये बिना ही हमारी कुशलक्षेम, वर्तमान उपलब्धता और पारिवारिक हालचाल जानने की पहल कर दी। हमने सम्मान सहित अभिवादन का प्रेषण करते हुए अपेक्षित प्रश्नों को हल करने का प्रयास किया। उन्होंने हिमालय की गोद से उतरकर देश की राजधानी में होने की सूचना दी। हम भी कब चूकने वाले थे, सो मन में चल रहे विचारों के ज्वार को भाटे की गोद तक ले जाने के लिए मिलने का समय निर्धारित कर लिया। उनके द्वारा आवंटित स्थान और समय पर हम उनके सम्मुख उपस्थित हो गये। अभिवादन करने के साथ ही उन्होंने सहजता का परिचय देते हुए हाथ जोडकर उत्तर ही नहीं दिया बल्कि अपने नजदीक के आसन पर आमंत्रित भी किया।

विभिन्न क्षेत्रों से जुडे हस्ताक्षरों की भीड के मध्य अग्रणीय स्थान मिलने के बाद हमारी निकटता स्वयं ही प्रमाणित हो गई। उन्होंने विशेष कक्ष में मौजूद अन्य लोगों की शंकाओं का समाधान करते हुए उन्हें विदा किया। अपने वरिष्ठ शिष्य को बुलाकर कुछ समय के लिए आगंतुकों के प्रवेश पर अस्थाई रोक लगा दी। अब हम दौनों ही विशेष कक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। हमने अपने मन में चल रहे संरक्षण, सुरक्षा और रक्षा के विचार मंथन से उन्हें अवगत कराया। वैदिक श्लोकों का उच्चारण करते हुए उन्होंने कहा कि चिर काल से ही इस महात्वपूर्ण कारक को प्रमुखता से लिया जाता रहा है। ऊर्जा चक्र की अप्रत्यक्ष किरणों के माध्यम से वैदिक कवच हर युग में प्रभावी रहे हैं। देवासुर संग्राम का सतयुगकालीन चरित्र, राम-रावण युद्ध का त्रेताकालीन संस्मरण, कौरव-पाण्डवों का कृष्ण की उपस्थिति में होने वाला व्दापरकालीन महाभारत इनके जीवन्त उदाहरण हैं। तब इन्हीं किरणों से अभिमंत्रित शस्त्रों व्दारा विजयश्री प्राप्त की गई थी। हमने उन्हें बीच में ही टोकते हुए कहा कि यदि ऊर्जा चक्र की किरणों के माध्यम से ही युद्ध में सफलता मिलना इतना सरल होता तो फिर वर्तमान में परमाणु हथियारों की होड में लगा विश्व समुदाय समय, संसाधन और सामर्थ की आहुतियां क्यों दे रहा है।

आपके शब्दों में कलयुगकालीन समय चल रहा है। क्या वर्तमान में इस ऊर्जा सामर्थ से किसी समस्या के निदान का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। उनके चेहरे पर नाच रही मुस्कुराहट और गहराती चली गई। उन्होंने भारत के चीन के साथ हुए युद्ध को रेखांकित करते हुए कहा कि उस समय की विकट परिस्थितियों को दतिया की मां पीताम्बरा पीठ के स्वामी जी की तपीय उर्जा और सामर्थ की दम पर ही एकदम पलटना सम्भव हुआ था। यह अलग बात है कि स्वामी जी को अपने प्राणों की आहुति देकर युद्ध नियंत्रक देवी धूमावती को संतुष्ट करना पडा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री से लेकर देश की सुरक्षा से जुडे लोग इस बात के गवाह रहे। जिन्होंने स्वामी जी के अनुष्ठानिक प्रभाव को युद्ध के परिवर्तित होती स्थिति अपनी जागती आंखों से देखीं थी। देश के प्रधानमंत्री के निवेदन पर ही स्वामी जी ने मातृभूमि की सुरक्षा के लिए अपनी जान निछावर कर दी थी। विषय वस्तु को विस्तार में जाने से बचाते हुए हमने सनातनकालीन संबंधों के आधार पर सुरक्षा को परिभाषित करने का निवेदन किया। उन्होंने रक्षा बंधन के पर्व को विस्तार से समझाते हुए कहा कि बहिन व्दारा रक्षा-सूत्र के प्रतीकात्मक धागे से भाई को रक्षात्मकता वचन देने का प्रत्यक्ष प्रयोग किया जाता रहा है।

यही परम्परा विस्त्रित स्वरूप में गुरू-शिष्य के रास्ते से विकसित होकर आराध्य-आराधक तक पहुंचती है। रक्षा-सूत्र की संस्कारित ऊर्जा आत्मबल में निरंतर बढोत्तरी करती है। यह भी अदृष्टिगत रहने वाले परिपेक्ष में सक्रिय रहती है। तीसरे बिन्दु की ओर ध्यानाकर्षित करते ही उन्होंने कहा कि अनुशासन के लिए हर युग में संविधान की रचना की जाती रही है। यह व्यवस्था देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित होती चली गई। स्वः के तंत्र की विवेकपूर्ण परिणति न होने के अभाव में अनुशासनात्मक स्वरूप के समाज की संरचना के लिए सर्वमान्य नियमों को मूर्त रूप देना पडा जिसमें कर्तव्यों, दायित्वों और अधिकारों का संतुलित विभाजन किया गया है। इसी सबको मिलाकर संवैधानिक बाध्यता का नाम दिया जाता है।

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि तभी उनके वरिष्ठ शिष्य ने दरवाजे पर हौले से दस्तक दी जिसकी स्वामी जी तत्काल उत्तर देते हुए उसे अन्दर आने की अनुमति प्रदान की। उसने आगन्तुकों में एक बडे राजनेता का नाम देकर उनकी उपस्थिति और लम्बी प्रतीक्षा से स्वामी जी को अवगत कराया। हमें लगा कि संत का काफी समय हमारी जिग्यासा की भेंट चढ गया है सो फिर मिलने का आश्वासन प्राप्त करके जाने की अनुमति मांगी। उन्होंने कमरे में उपस्थित शिष्य को प्रसाद तथा अंगवस्त्र लाने को कहा। कुछ ही समय में अपेक्षित सामग्री एक चांदी के थाल में सजकर पहुंचा दी गई। उन्होंने हमें अंगवस्त्र उढाकर प्रसाद भेंट किया। उनकी सहजता, विनम्रता और आत्मीयता देखकर हृदय गदगद हो उठा। संवेदनाओं के तूफान ने अन्तःकरण से निकलकर पलकों को नम कर दिया। प्रमाम करके हमने दरवाजे की ओर कदम बढाये। इस बार बस इतनी ही। अगले हफ्ते एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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