इक्कीसवीं सदी और हम
| Rainbow News - Aug 8 2017 12:35PM

- रिजवान चंचल

हमारी सोंच का किस, हदतलक सीमित है पैमाना
जहाँ कल थे वहीं हैं आज, आगे भी यही ठाना!
  पिलाकर दूध गणपति को,नहीं कुछ सीख हम पाए
  ना अपना कान है देखा, रहे कौवे को दौडाए!
सुना जब ये की सोते में,हुए कुछ लोग हैं पत्थर
तो बिस्तर छोड़ के भागे,नहीं घर में रुके पल भर!
  यूं ही मुहनुचवा बंदर ने, बड़ा आतंक ढाया था
  छतों पे सोना मुस्किल था,हवा में वोभी आया था!
प्रशासन और शासन भी समझ, कुछ भी नहीं पाया
हवा में तीर ये आखिर, कहाँ कब किसने चलाया!
  नहीं भूले अभी तक हम,हुई रोटी की पूजा भी  
  हरइक अफवाह की हदतक,सदा बढ़चढ़ हिमायत की!
नहीं सोचा नहीं समझा, नहीं देखा नहीं जाना
जहाँ हम थे, वहीं पर हैं, रहेंगें भी, यही ठाना!
  कहे ‘चंचल’ ये चिल्लाकर, अगर बदला न पैमाना
  कटी हैआज चोटी गर,तो कल है नाक कट जाना!

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प्रश्न ये सबसे मेरा

- रिजवान चंचल

’प्रश्न ये सबसे मेरा, बताये कोई चितेरा
   कोई बताये इतना जर्जर, क्यों है आज किसान?
   आये दिन क्यों फांसी लटके, धरती का भगवान
प्रश्न ये सबसे मेरा, बताये कोई चितेरा
   कलम है रोती विलख विलख कर, सच्चाई जब लिखते
   फटा कलेजा जाता मेरा, शब्द नहीं कुछ मिलते
कल हीे बुधुआ की बीबी न, जेवर उसे थमाया
आंसू आँख में छलके लेकिन ,पत्नी धर्म निभाया
   जान रही थी सूदखोर ने,पति को था हड़काया
   मंगल सूत्र छोड़कर वो था,गिरवीं सब धर आया
सूद चुकाया जाकर उसने,हुआ बहुत बेजार
वापस घर ना लौटा फिर वो,छोड़ गया संसार
   क्यों सावन में फांसी  झूला....?क्यों दी उसने जान..?
   सूद खोर के डर के आगे,टिका ना क्यों भगवान?
प्रश्न है सबसे मेरा, बताये कोई चितेरा
   क्यों बरबाद किसान है इतना.? मौतें ये क्यों  जारी.?
   ‘चंचल’ हल इस प्रश्न का आखिर क्यों पड़ता है भारी..?
प्रश्न है सबसे मेरा, बताये कोई चितेरा



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